रविवार, 3 अगस्त 2014

परम् पद की प्राप्ति

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जो भी मनुष्य प्रकृतीय मोंह से मुक्त होकर, जिसने अपनी ईंद्रीय वासनाओं की भोग की कामना पर विजय कर लिया है, जो सदैव आत्मबोध को धारणकर, बिना फल की कामना किये कर्म को करता है वह सर्वोच्च परम् सत्य की दिव्य शांति और आनंद के जीवन का भोग करता है । इस उपलब्धि पर योगशास्त्र का लक्ष्य पूर्ण होता है । 

शनिवार, 2 अगस्त 2014

रस्सा कशी

परम् सत्य ने मनुष्य को ऐसा बनाया है कि इसका जीवन प्रकृति और आत्मा के मध्य परस्पर व्यवहृत करने की एक रस्सा कशी के सदृष्य है । प्रकृति आत्मा को अपने गुणों में मोंहित करने में सदैव सफल होती है । प्रकृतीय गुणों में मोहित आत्मा इंद्रीय भोगो के लिये लालायित रहती है । इस प्रक्रिया से गुज़रती आत्मा सर्वथा अपने स्वरूप और ईश्वरीय मर्यादा को पूर्णतया विस्मृत कर अहंकार के वशीभूत इच्छाजनित कार्यों को करने में संलग्न रहती है । यह स्थिति मनुष्य को दु:ख और संताप के हिलोरों के मध्य उठाता पटकता रखती है । इसके विपरीत यदि सत्संग के प्रसाद से   कंचिद कोई आत्मीय बोध और ईश्वरीय मर्यादा के जीवन पाने को प्रयत्नशील होता है तो उसे एक संघर्ष की स्थिति का सामना करना होता है । प्रकृतीय मोंह का नाश विषेस प्रयत्नों से ही सम्भव है । 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

बाधा से मुक्ति

अपने अस्तित्व की सही पहचान में बाधक मोंह और आसक्ति से मुक्ति हेतु सुझाये गये मार्ग भक्ति अथवा कर्म को अपनाना होगा । भक्ति समर्पण है । कर्म आत्मविश्वास है । जिसे जो अनुकूल प्रतीत हो वह उसे अपनावे । परिणाम दोनो ही पथ से एक ही मिलेगा । मोंह और आसक्ति से मुक्ति । भक्ति अथवा कर्म ये आपकी आत्मा का स्वरूप नहीं हैं । परंतु मोंह और आसक्ति से ग्रसित आत्मा की मुक्ति के पथ हैं साधन हैं । व्याधियों से मुक्त हो जाने पर आत्मा अपने ईश्वरीय गुणों को प्रगट करेगी । उस शाश्वत् रूप के प्रकाश से व्यक्तित्व का नया उत्कृष्ट परिचय प्रगट होगा । 

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

पहचान की बाधा

मनुष्य द्वारा अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया की पहचान उसे नहीं मिल पाती है । इस अल्पता का मुख्य कारण (1) उसकी प्रकृतीय गुणों के प्रति मोंह (2) इंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना (3) अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया के प्रति अचेत मस्तिष्क की दशा (4) इच्छाजनित कार्यों को करने का अभ्यास होता है । इसलिये यदि कोई जीवन की चर्मोत्कर्ष उत्कृष्ठ आनंद स्थिति को अनुभव करने और उसी आनन्द की स्थिति को अपने जीवन का सत्य स्वरूप /-ा*े*-ो*-9999999े-्+ट होना चाहे तो उसे उपरोक्त चार बाधाओं को विजय करना लक्ष्य करना होगा । बाधाओं के हटने पर परम् सत्य का दर्शन आपको अपने अंदर मिल जावेगा ।+-+* 

बुधवार, 30 जुलाई 2014

संघर्ष

उत्थान की प्रकृया मानसिक विचारों के संघर्ष को विजय करते हुये ही सम्भव होती है । संघर्ष उन मानसिक विचारो से जो हमें बंधन की ओर प्रवृत्त करते हैं । स्थापित करना लक्षित होता है उन विचारों को जो हमें मुक्ति की ओर अग्रसर करते हैं । बंधन वाले कर्मों को हम सतत जन्मों से करते आये हैं । उन्हे करना हमारा सहज़ अभ्यास है । मुक्ति को अग्रसर कर्म पहले तो हम जाने । फिर उन्हें करने की विधा से भिज्ञ होंवे । फिर ऐसे कर्मों को करना अपना आम अभ्यास बनावें । इस समस्त प्रक्रिया से पूर्व मस्तिष्क में एक संघर्ष स्वाभाविक है । आम अभ्यास को छोड एक नये विशिष्ट को अपनाना । जो इस संघर्ष को विजय कर मुक्ति के पथ पर प्रवृत्त होता है । उसे मिलता है आनंद । 

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

मोंह

आत्मा प्रकृति के मध्य रहकर, प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होते हुये सहज़ रूप से प्रकृतीय गुणों और इंद्रीय वासनाओं की आसक्ति जनित कर लेती है । इसी व्यापक आसक्ति को एक शब्द में व्यक्त करने के लिये मोंह शब्द का प्रयोग किया जाता है । यह जटिल व्याधि है । रोगग्रस्त को दुसह अशांति और कलह प्रदान करने वाली होती है । इस व्याधि के विद्यमान रहते मनुष्य और अधिक मोंह में बँधता चला जाता है । इसके कुप्रभाव से बचने का मात्र एक उपाय होता है विद्यमान मोंह को निर्मूल करना । इस उपलब्धि के लिये कोई बाहरी औषधि अथवा विधा सहायक नहीं हो सकती । आत्मचेतना को जाग्रित करना ही एकल पथ है । दृढ प्रयत्न द्वारा मोंह नाश होता है । प्रतिफल स्वरूप आनंद प्राप्त होता है । 

सोमवार, 28 जुलाई 2014

प्रकृति का आच्छादन

इच्छा के रूप में प्रकृति का आच्छादन किस सीमा तक परम् सत्य की मनुष्य में विद्यमान छवि को धूमिल किये रहती है इसका सही आँकलन व अनुभूति तभी सम्भव होती है जब विषेस प्रयत्नों के द्वारा इस आच्छादन को समाप्त किया जाता है । इस आच्छादन के प्रभाव से जीवन का स्वरूप आनंद से विछुड कलह तक किस प्रकार पहुँच जाता है यह प्रकृति का विज्ञान है । सहज़ रूप से बिना विचारे जीवन यापन में सामन्य प्रक्रिया के अंतर्गत मोंह का आच्छादन ही एक मात्र उपलब्धि होती है । विवेक के प्रयोग से जाग्रित आत्मचेतना के द्वारा आनंद का पथ प्रशस्थ होता है । परम् सत्य के चिंतन, परम् सत्य को समर्पण, व परम् सत्य की अपेक्षानुसार उन्ही की शक्ति से समस्त कार्यों का सम्पादन के द्वारा आच्छादित मोंह का नाश सम्भव होता है । 

रविवार, 27 जुलाई 2014

रचना का विज्ञान

समस्त प्रकृतीय रचना में निहित विज्ञान ही इस समस्त संसार के स्वरूप, गति, गंतव्य का श्रोत है । यह अद्भुद विज्ञान ही प्रेरक आत्मा को बाँधे हुये भी है । उसकी सेवा के सहारे समस्त कर्मों को सम्पादित भी कराता है । जबकि आत्मा प्रकृति का शासक है । प्रकृति के ग़ुण ही प्रकृति की शक्ति है । इन्ही गुणों के मोंह में पडकर आत्मा शासक होते हुये भी दास बनकर रह जाता है । यह समस्त मात्र रचना के विज्ञान के प्रभाव से सम्भव हो जाता है । इसीलिये यदि प्रकृति के मोंह की जेल से  शासक आत्मा को मुक्त कराना है तो (1) या तो आत्मा, प्रकृति और मोंह तीनो के ज्ञाता बनिये (2) या प्रकृति को आत्मसमर्पण करिये (3) या नियंत्रित कर्म करिये । आत्मा मोंह से मुक्त हुये बिना और अधिक मोंह में बँधता ही जायेगा । कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं । अंधकार का नाश प्रकाश से ही सम्भव है । कोई दूसरा उपाय नही होता है ।  

शनिवार, 26 जुलाई 2014

प्रकृति का स्वरूप

समस्त दृष्य संसार प्रकृति है । प्रकृति ही मूल अवयव भी है, प्रकृति ही स्वरूप भी है, प्रकृति ही विस्तार भी है, प्रकृति ही संचार भी है, प्रकृति ही प्राण भी है । प्रकृति ही बंधन है । प्रकृति ही कर्ता है । प्रकृति ही समस्त स्वरूप में निहित विज्ञान भी है । समस्त शक्तियों से युक्त होते हुये भी प्रकृति प्रेरक नहीं है । प्रकृति का स्वरूप यदि ग्राह्य हो जाय तो जीवन यापन सुगम हो जाय । प्रकृति के स्वरूप की अंधता ही समस्त भ्रमजाल में भटकना है । ज्ञानी पुरुष प्रकृति को सदैव समर्पित भाव से आदर करता है । उसकी कृपा की याचना करता है । उसके आदेश को नतमस्तक हो शिरोधार्य करता है । जीवन क्लिष्टताओं से मुक्त होगा तो शांति की उपलब्धि होगी । शांति सत्कर्मों के लिये मूल आधार है । 

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

नियतिवाद और स्वतंत्रता

कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन पर हमारा कोई वश नहीं होता है । जैसे हमारा जन्म किन परिस्थितियों में, किस देश में, किस माता पिता के द्वारा हुआ इसपर हमारा कोई वश नहीं होता है । इसे पूर्व नियत कहा जा सकता है । परंतु हम क्या कार्य करेंगे क्या नहीं करेंगे यह मेरे निर्णय के अधीन होता है । किसी एक व्यक्ति को जन्म अच्छे परिवारिक परिवेश में नहीं हुआ परंतु वह सही कर्मों के चुनाव द्वारा उत्कृष्ठ सामाजिक स्थितियों को पाता है । इसके विपरीत एक व्यक्ति का जन्म उत्कृष्ठ पारिवारिक परिवेश में हुआ परंतु वह गलत कर्मों के चयन के फलस्वरूप अपने समस्त प्राप्त वैभव को खो बैठता है । इसप्रकार नियतवाद और स्वतंत्रता का संतुलन पूर्णरूप से जीवन को व्यवहृत करने के ऊपर निर्भर करता है । सही चयन द्वारा जीवन यापन करने पर नियतवाद को पूर्ण नियंत्रित किया जा सकता है । अपनी स्वतंत्रता का सही प्रयोग । 

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

चयन

वस्तुत: परम् सत्य और प्रकृति यह दो आधारभूत अवयव हैं जिनसे सारा संसार बना है । दोनों ही पूर्णतया भिन्न होते हुये भी इस प्रकार सयुँक्त है प्रत्येक स्वरूप में कि इनको अलग करके दो अलग स्वरूपों में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है । मनुष्य के जीवन को विचारणीय होने पर प्रश्न यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इनमें से किस अवयव की वरीयता को ग्रहण कर जीवन जीया जाय । समस्त धर्मदर्शन यह अनुमोदित करता है कि परम् सत्य के प्रधानता को ग्रहण कर जीवन जीना उत्तम पथ है । बाधा क्या होती है कि समस्त संसार पूर्णरूप से प्रकृति की वर्चस्व से संचालित हो रहा है । इसलिये धर्मदर्शन की अनुशंसा अनुसार पथ चुनने पर विषेस कठिन स्थितियों से उबरना पडता है । इसीलिये दृढता अनिवार्य वाँक्षना बन जाती है । इन तथ्यों से भिज्ञ रहते हुये चुनाव करना सही निर्णय प्रशस्थ करेगा । 

बुधवार, 23 जुलाई 2014

निरंकार

जल के समुद्र में डूबे रहिये परंतु जल से अछूता रहिये । आत्मा प्रकृति के मध्य में रहे परंतु प्रकृति से अछूता रहे । निरंकार । भगवान शंकर को निरंकार बताया जाता है । माता पार्वती तो सदैव उनके साथ रहती हैं । उनके दो पुत्र भी बताये जाते हैं । परंतु निरंकार की श्रेणी में वह शिरोमणि माने जाते हैं । यह ऐसा concept है जो कि यदि समझ में आ जाय तो मानो सर्व ज्ञान मिल गया । प्रकृति में रखा गया । प्रकृति के गुणों का भोक्ता बनाया गया । यह सब मनुष्य ने स्वयं तो रचा नहीं । यह तो ब्रम्ह ने ही रचा । -परंतु अपेक्षा भी रखी । निरंकार । प्रकृति में रहना । प्रकृति के गुणों का भोग भी करना । परंतु प्रकृति से अछूता रहना । जो इस रहस्य को समझ सके । वही ज्ञानी । जो इस रहस्य को अपने जीवन में जी सके । वही आनंद को जाने । निरंकार । भगवान के शहस्त्र नाम । फिर भी निरंकार । भक्त निरंकार । 

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

दिव्य जन्म और कर्म

मनुष्य के मस्तिष्क में प्रकृतीय रचना और विज्ञान के प्रभाव द्वारा सात्विक और तामसिक दोनो ही प्रकार के विचार भाव सृजित होते हैं । इनमें से हितोपियोगी विचारभाव को जानना, कलुषित भ्रमात्मक विचारभाव से मुक्ति पाना, ही जीवन की सफलता है । परम् सत्य के अंश आत्मा का अनुभव पाना, आत्मा की गरिमा के अनुरूप जीवन जीना ही सार्थकता है । दिव्य जन्म है । समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है और प्रेरक स्वयं परम् सत्य हैं । इस विचार भाव को ग्रहण कर किये जाने वाले कर्म दिव्य कर्म होते हैं । दिव्य जन्म होने पर दिव्य कर्म को करने वाली आत्मा का परम् सत्य में विलय हो जाता है । क्योंकि पुनर्जन्म तो मोहाशक्त आत्मा का होता है । मानो प्रकृति मोहाशक्त आत्मा को मोंह से मुक्त होने के लिये बार बार अवसर देती  है । 

सोमवार, 21 जुलाई 2014

अहंकार का नाश

अपने अंदर तमस और रजस को समाप्त करने के लिये हम सत्व का सहारा लेते हैं । परंतु सत्व में भी हम अहंकार से मुक्त नहीं होते हैं । मात्र हमारी इच्छायें और कर्म कुछ अपेक्षाकृत परिमार्जित विचारों के लिये हो जाते हैं । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य को पहचानने के लिये हमें अपने अहंकार को पूर्ण समाप्त करना होगा । हमारे आत्मा को परम् सत्य के प्रदर्षित रूप के समान परिमार्जित करना होगा । हम उस परम् सत्य के प्रगट रूप हैं । इस स्वरूप में बन जाना होगा । इस स्वरूप में अहंकार का कहीं कोई अस्तित्व रह ही नहीं जावेगा । अस्तित्व तो मात्र परम् सत्य का ही होगा । 

रविवार, 20 जुलाई 2014

एक संशय

इच्छाओं की पूर्ति में कर्म करने का हर प्रत्येक मनुष्य का जन्मों से अभ्यास बना हुआ है । इसलिये जब उसे सुझाव मिलता है कि योग की अवस्था में कर्म करने का अभ्यास मुक्तिदायक है तो अति स्वाभाविक क्रम में वह एक प्रश्नवाचक संशय को प्राप्त होता है । उसे होता है कि अभी हम अपना लाभ हानि सोचकर अपना काम करते हैं । कहीं हम योग का प्रयत्न करें और यदि ना सफल हुये तो हम दोनों से गये । ना ही हम अपने लाभ-हानि के अनुरूप कार्य किये और ना ही हम योग के सुझाव के अनुसार आत्मिक प्रधानता का ही कार्य कर सकें । फिर तो हम पूर्ण असफल ही हो जावेंगे । इस संशय को लेकर मस्तिष्क अशांत हो जाता है । वह पूर्ण अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाता है । यद्यपि कि यह संशय निराधार होता है ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण मोहाशक्त अर्जुन को बताते हैं कि जो मनुष्य अपनी भावना और कर्म में साश्वत् है उसे कभी दु:ख की छाया भी नहीं मिल सकती है । कोई भी सत्कर्म करने वाला किसी भी बुराई को नहीं प्राप्त हो सकता है । यह प्रकृति की व्यवस्था द्वारा है । इसका कोई अपवाद नहीं होता है ।   

शनिवार, 19 जुलाई 2014

सत्य का ज्ञान

प्रकृति की मंशा मानवमात्र को सत्य के ज्ञान से युक्त करना एवं उस सत्य की मर्यादानुसार प्रत्येक मनुष्य का आचरण विकसित करना है । संसार की समस्त प्रक्रियाँये पूर्वनिर्धारित संचालन नहीं है अपितु सत्य को जानकर सत्य की अपेक्षानुसार कर्म करने का लक्ष्य निर्धारित कर कर्म द्वारा हो रहीं है । मोंह ही हमारा अज्ञान है । जिस क्षण हम मोंह को काट प्रकृति के कर्तापन को स्वीकार कर कर्म में उद्यत होते हैं हम अपने सत्य स्वरूप में स्थापित हो जाते हैं । हमें कर्म के फल की कामना नहीं रह जाती है । मनुष्य का जन्म ही इसी उद्देष्य से हुआ है कि वह जन्मदेने वाले की मंशा के अनुरूप कर्म करे । हमें अपनी भावनाओं पर विजय करना होगा, अपने अंदर विद्यमान भ्रम का नाश करना होगा, अपने कर्मों को नियंत्रित करना होगा अन्यथा हम मोंह के शिकार हो जावेंगे और फिर कर्मफल का पीछा करने लगेंगे । 

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

कर्म द्वारा आत्मज्ञान

हम सभी का कर्म फल की कामना से कर्म करने का अभ्यास बना हुआ है । परंतु जिस पल हम कर्म को कर्म फल की कामना के बगैर करना शुरू करते हैं तत्काल ही अनुभव आता है कि हम जैसे चिर प्रतीक्षित सही पथ को पा गये हैं । मानो अपने अंदर विद्यमान आत्मा की अनुभूति इन्ही इच्छा जनित कर्मों द्वारा ही ढकी हुई थी । फल की कामना के भ्रम में किये जाने वाले कर्म हमें अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा के अपने अनुभव को हमसे दूर किये रहते हैं । इस अनुभूति के ना होने से हम अपने सत्य स्वरूप से ही अनभिज्ञ रहते हैं । इस प्रकार आत्मा का अनुभव पाने के लिये हमारे लिये सरलतम उपाय है कि हम कर्मफल की इच्छा के बिना ही कर्म करने का अभ्यास सृजित करें । 

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

सत्य में विलय

आत्मा परम् सत्य का ही अंश है । इसकी प्रकर्ति के साथ आसक्ति इसके स्वाभाविक स्वरूप का विभ्रंश है । द्वैत पुरुष और प्रकृति में है । परिवर्तनशील प्रकर्ति में अपरिवर्तनीय सत्य की आसक्ति आत्मा की गरिमा का नाश है । इस तथ्य का जब भी बोध हो जाय और विषेस प्रयत्नों द्वारा आत्मा को विजातीय की आसक्ति से मुक्त करा उसे स्वतंत्र मूल स्वरूप में वापस लाया जाय तो यह प्रक्रिया परम् सत्य में विलय के तुल्य होगा । आत्मा को परम् सत्य ने व्यापक प्रयोजन हेतु प्रकृति के मध्य रखा है । इसका प्रयोग निज़ी स्वार्थ की पूर्ति अथवा व्यक्तिगत यश अर्जित करने के उद्देष्य से करना इसका दुरुपयोग है । 

बुधवार, 16 जुलाई 2014

सही का चुनाव

मुक्ति और बंधन का विचार केवल मनुष्य योनि के लिये है । परम् सत्य सदैव मुक्त है । वनस्पति और जानवर इस परिधि में आते ही नहीं हैं । मनुष्य यदि केवल वंश परम्परा से प्राप्त गुणों से संचलित होता तो नैतिकता का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता । सत्य और असत्य का ज्ञान होने के बाद क्या उचित होगा का चुनाव करना यह विवेक का विषय है । यह विवेक जब सही स्वरूप में जाग्रित होता है तभी कोई उत्थान के पथ पर अग्रसर हो सकेगा । गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोंह से ग्रसित अर्जुन को सत्य और मोंह दोनो का स्वरूप बताने के बाद अर्जुन को अपनाने के लिये चुनाव करने को कहते हैं । यह अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थल होता है । 

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

आत्ममय प्रकृति

आत्मचेतना की वह सीमा जहाँ शरीर की प्रकृति पूर्णरूप से आत्मा के बोध से संतृप्त हो जाय । शरीर की प्रकृति आत्मा के भाव से ओतप्रोत हो जाय । आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो स्वतंत्र है । मोंहजनित आवश्यकतायें आत्मा की स्वतंत्रता से पूर्णरूप से पराजित हो चुकी होंवे । यह आत्मा की प्रकृति पर विजय है । आत्मा प्रकृतीय मोंह में बँधकर प्रकृति का दास बन जाता है । आत्मा की मोंह पर विजय उसकी स्वतंत्रता है । यह स्वतंत्रता इतनी बढ जाय कि मानों प्रकृति को आगे आत्मा को अपने मोंह में बाधने की मंशा ही नहीं रह जाय । सम्पूर्ण प्रकृति ही आत्ममय हो जाय । 

सोमवार, 14 जुलाई 2014

सत्य और क्षणभँगुर

परिवर्तनशील के मोंह में जब तक अपरिवर्तनशील आसक्त है तब तक वह बंधन में है । जब अपरिवर्तनशील परिवर्तनशील के क्षणभँगुरता का अनुभव कर अपने अपरिवर्तनशील स्वरूप की गरिमा को अनुभव कर लेता है तो वह मोंह से मुक्त हो परम् सत्य के स्वरूप में समाहित होने को उन्मुख हो जाता है । प्रकृतीय मोंह मात्र भ्रम है । अपरिवर्तनीय की गरिमा सत्य है । इस सत्य का अनुभव होना ही ज्ञान है ।

रविवार, 13 जुलाई 2014

उद्देष्य

किसी भी व्यक्तित्व के उत्कर्ष में उद्देष्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान होता है । व्यक्ति क्या उद्देष्य धारण कर जीवन यापन कर रहा है । उस उद्देष्य को अपने समस्त कार्यकारी अंगों के आम अभ्यास के रूप में व्यवहृत कर रहा है । उस उद्देष्य की पूर्ति में उसने अपने कर्तापन के अहंकार को कितना निर्मूल कर लिया है । उसने सर्वभौम परम् सत्य के प्रयोजन को पूर्ण करना ही मानो अपना उद्देष्य निर्धारित कर लिया है । सर्वभौम सत्य ने इस संसार को चर्मोत्कर्ष ज्ञान तक पहुँचाने के लिये ही बनाया है । इसलिये जो भी मनुष्य उस सर्वभौम सत्य के प्रयोजन को ही अपना उद्देष्य निर्धारित करेगा उसके व्यक्तित्व का अतुलनीय विकास होगा । 

शनिवार, 12 जुलाई 2014

संतुलन

किसी भी मनुष्य के जीवन में दो मूल्यों (1) वह अ[पने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा का कितना सम्मानजनक उपयोग करता है (2) प्रकृतीय मोंह में कितना आसक्त है, के मध्य क्या संतुलन है, निर्धारित करता है उस व्यक्ति का जीवन स्तर । कोई भी मनुष्य पूर्णरूप से ना ही अपनी इच्छाओं का पूर्णनियंत्रण कर आत्मा के ईश्वरीय सम्मान को निर्विवाद रूप से स्थापित कर सका है और ना ही कोई इतना चर्मोत्कर्ष आसक्त ही है जो रंचमात्र भी ईश्वर के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता है । इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के जीवन का भेद इसी दो मूल्यों के तुलनात्मक संतुलन के द्वारा निर्धारित होता है । जो सचेष्ट हो अपने अंदर ईश्वरीय मर्यादा को पूर्णरूप से स्थापित करने को प्रयत्नशील होता है उसका जीवन अधिक शांत और आनंद को प्राप्त होता होता है । जो बिना विचारे आसक्ति में लिप्त रहता है वह अधिक अशांत और दु:ख की स्थितियों के मध्य जीवन बिताता है । 

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

आत्मा की गरिमा

आत्मा परम् सत्य का अंश है । यह मात्र परम् सत्य को व्यक्त करने वाला नहीं है अपितु उसका वास्तविक पुत्र समान हिस्सा है । इस सत्य को जो भी व्यक्ति अपने जीवन में सत्यरूप में अनुभव कर तद्नुसार उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप जीवन यापन कर सकता है वही सर्वोत्कृष्ट जीवन का भोग करता है । प्रकृतीय मोंह में बँधना आम जीवन का स्वरूप है । इस मोंह से बचना विषेस उपलब्धि है । विषेस उपलब्धि विषेस प्रयत्नों से ही मिलेगी । यह उस परम् सत्य का विज्ञान है कि उन्होने संसार को ऐसा बनाया है कि इसमें भटकना आम पद्धति है । परंतु इस प्रचलित विचलन से बचकर विषेस जीवन भी हममें से ही लोग पाते हैं । इसके लिये आत्मा की गरिमा को पहचानना । उस गरिमा के अनुरूप आचरण करना ही अपेक्षित प्रयत्न है । 

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

वास्तविक परिचय

मनुष्य के व्यक्तित्व का वास्तविक परिचय उसके अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया है । जो भी मनुष्य अपने वास्तविक अस्तित्व उस परम् सत्य की उपस्थिति को अपना परिचय बनायेगा उसका ही व्यक्तित्व सर्वोत्कृष्ट होगा । इस स्थिति को पाने में बाधा मात्र मोंह होता है । प्रकृतीय गुणों में मोंह । इंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना । यही आच्छादन समाप्त होते ही हमारे अंदर विद्यमान ब्रम्ह प्रगट हो जावेगा । उसके आलोक में हमारे समस्त कृत पावन हो जावेंगे । हमारे विचारों का दायरा सर्वहिताय हो जावेगा । हम स्वार्थ के संकीर्ण जेल से मुक्त हो समस्त जगत के कल्याण के लिये अपनी सेवायें अर्पित करने को उन्मुख हो जावेंगे । जिस विधाता ने हमें जन्म दिया है कंचिद उसका मंतव्य यही था । 

बुधवार, 9 जुलाई 2014

मनुष्य शरीर

परम् सत्य का अंश हमारे सम्पूर्ण अंत:करण में समाया हुआ है । यह किसी भी बाह्य अन्य द्वारा अभेद्य है । यह मृत्यु और जन्म के सीमा से परे है । यह हमारे सम्पूर्ण जीवन का साक्षी होता है । इसके अतिरिक्त शरीर का प्रत्येक घटक विकसित होने वाला व मृत्यु द्वारा विलीन होने वाला है । जब तक मनुष्य को अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की पहचान नहीं होती और वह अपने विनाशशील शरीर को ही अपनी पहचान जानता है वह अज्ञान के अंधकार में जीवन जीता है । जब भी मनुष्य अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य को अनुभव करता है उसके जीवन का सम्पूर्ण रूप ही बदल जाता है । वह परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप कर्म करने लगता है । परम् सत्य की मर्यादा के अनुरूप जीवनजीने लगता है । वह परम् सत्य का जीवित प्रारूप ही बन जाता है । उसके जीवन में उसके विनाशशील शरीर का ढाँचा मात्र रह जाता है । उसका वास्तविक जीवन परम् सत्य का ही प्रगट रूप हो आता है। 

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

उत्तरोत्तर प्रगति

परम् सत्य अपने स्वरूप में अनंत, एकाकी, किसी दूसरे स्वरूप में विलय ना होने वाला और अपने में ही आनंदित रहंने वाला है । प्रकृतीय रचनाओं में परस्पर विरोधी स्वरूप और गुण प्रगट हुये हैं जो कि परम् सत्य को छिपा देने में समर्थ होते हैं । वर्तमान सृष्टि की समस्त रचनाओं में पाँच स्तर पाये जाते हैं । अन्न, प्राण, मनस, विज्ञान और आनंद । यह उत्तरोत्तर विकास है । मनुष्य चौथे स्तर विज्ञान श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है । इसे अभी आनंद की श्रेणी पाना शेस है । यह उपलब्धि सत्य का ज्ञान होने, सत्य के विधान के अनुरूप जीवन जीने से सम्भव होगी । यह स्थिति प्राप्त होने पर वह इस संसार की चर्मोत्कर्ष स्थिति को भोग करेगा । 

सोमवार, 7 जुलाई 2014

परम् सत्य और मोंह

परम् सत्य पूर्णतया पारलौकिक स्वत: अस्तित्व है । गुणयुक्त प्रकृति बंधनकारी है । मनुष्य जो कि प्रकृतीय रचना है परम् सत्य के अंश आत्मा से युक्त है । आत्मा प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होती है । इसलिये अज्ञानवश प्रकृतीय गुणों में मोंह जनित कर लेती है । सत्य स्थिति का ज्ञान ना होना अज्ञान है । सत्य स्थिति के अनुसार आत्मा समस्त कर्मों का प्रेरक है जबकि समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । इस सत्य को जानना । इस सत्य की मर्यादा में जीवन जीना । ज्ञान के प्रकाश में जीवन जीना है । इस सत्य के विपरीत अपने में कर्तापन का अहंकार करना । अपने को कर्ता मानते हुये अपनी इच्छा के कर्मों को करना । अज्ञान के अंधकार में जीवन जीना है । अज्ञान प्रवृत्त करता है बंधन । ज्ञान प्रवृत्त करता है मुक्ति । 

रविवार, 6 जुलाई 2014

आनंद

मनुष्य के प्रगति की सीमा परिभाषित की जाती है आनंद द्वारा । मनुष्य विज्ञान से उन्नति कर आनंद को पाता है । यह स्थिति मोंह से मुक्त होने के उपरांत ही प्राप्त हो सकती है । मुक्त आत्मा ब्रम्ह नहीं होती परंतु ब्रम्ह की अनुभूति से आनंद की स्थिति में होती है । आत्मा इस पंचतत्व की शरीर से भिन्न अस्तित्व है । इसकी अनुभूति प्रेरित करती है मुक्ति । मुक्त मिलने पर मिलता है आनंद । यही सर्वोच्च शिखर होता है प्रगति का । इसे पाना ही चर्मोत्कर्ष उपलब्धि है । 

शनिवार, 5 जुलाई 2014

साकार ब्रम्ह प्रकृति

परम् सत्य निर्गुण, निर्विकार, निर्लिप्त, चिर, दिव्य शांत स्वत: अस्तित्व है । प्रकृति उसकी रचना है । प्रकृति के रूप में परम् सत्य ने अपने को प्रगट किया है । सामान्य मनुष्य के लिये प्रकृति ही परम् सत्य का प्रगट ब्रम्ह स्वरूप है । इसी प्रकार मुक्त आत्मा आनंद से ओतप्रोत शांत भाव से कार्य में संलग्न होती है । उसे अलग अस्तित्व की कोई कामना नहीं होती है परंतु फिर भी वह एक अलग स्वरूप में परम् सत्य का प्रतिनिधित्व करती है । उसका अपना कोई प्रयोजन नहीं होता है फिर भी वह कार्य करती है । परम् सत्य की हमारे अपने अंदर उपस्थिति को किसी ज्ञानेंद्रिय के माध्यम से नहीं जाना जा सकता है परंतु अनुभव किया जा सकता है । 

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मुक्त जीवन

मुक्त आत्मा के धारक का जीवन मस्तिष्क और शरीर उस परम् सत्य की अनुभूति द्वारा मोंह के आच्छादन से पूर्ण मुक्त एक ज्योति के समान सत्य से प्रकाशित आभा के रूप में प्रगट होता है । उसका व्यक्तित्व का चर्मोत्कर्ष उत्कर्ष जिसमें हर्ष की मुद्रा स्वतंत्र अभिव्यक्ति किसी भी कलुषता के कलंक से रहित उत्कृष्टतम स्वरूप उदय होता है । वह मानों अपनी उपलब्धि को समस्त मानव समाज में वितरित कर देना चाहता है । उसका जीवन एक प्रतीक स्वरूप हो जाता है जिसे देख हर मोंह में आसक्त व्यक्ति प्रेरणा ग्रहण करे कि मुक्त जीवन ही आदर्श जीवन रूप है जिसे पाने के लिये हर सम्भव प्रयत्न किया जाय । 

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

परम् सत्य की शक्ति

मुक्त आत्मा परम् सत्य की शक्ति द्वारा परम् सत्य के प्रयोजन के कार्यों को करता है । वह परम् सत्य की अनुभूति में सदैव हर्षित रहता है । वह परम् सत्य की शक्ति और उर्जा से ओतप्रोत हर्षित मन सेवा में तत्पर रहता है । उसके व्यक्तित्व में द्वैत में विभाजित निष्ठा पूर्णरूप से लुप्त हो जाती है । वह चेतन, अर्धचेतन, तथा अचेतन की प्रत्येक अवस्थाओं में परम् सत्य की अनुभूति को ही प्रगट करता है । वह परम् सत्य की अनुभूति व उर्जा द्वारा सदैव हर्ष उल्लास की दशा में परम् सत्य के ज्ञान से प्रकाशित होता है । उसका जीवन मानो परम् सत्य का ही प्रगट स्वरूप बन जाता है । 

बुधवार, 2 जुलाई 2014

दु:ख

मस्तिष्क में इच्छाये छायी हुई हैं । इच्छाये पूरी नहीं हो रहीं है । वह दु:ख से बोझिल है । उसकी शरीर में कोई व्याधि नहीं, पीडा नहीं, परंतु फिर भी अशांत और दु:खी है । सारे दु:खों का श्रोत उसकी इच्छाये हैं । इन्ही इच्छाओं की उपस्थिति हमें अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की अनुभूति नहीं होने देती । हमारी इच्छायें ही हमारी सबसे विकट शत्रु हैं । फिर भी हम सभी को इच्छायें ही सबसे अधिक प्रिय हैं । लगता है कि इच्छायें ही सबसे बडी निधि हैं । यही मोंह हमें ईश्वर की अनुभूति से दूर किये रहता है । अनेकानेक दु:खो को हमारे ऊपर थोपे रहता है । 

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

सधर्म्य

मोंह से मुक्त आत्मा परम् सत्य के स्वरूप में विलीन होकर पूर्ण ईश्वरीय भोग में यापन करती है । ईश्वर स्वरूप में मनुष्य जीवन । ईश्वर की प्रेरणा से ईश्वर के कार्यों को करती है । आत्मा का ईश्वर में विलय हो जाता है । वह ईश्वर का रूप धारण कर लेती है । ईश्वर में एकीकृत स्वरूप । जितात्मन:, युक्तचेतसा, ऐसी आत्मा जो ईश्वर की अनुभूति से ईश्वरमय हो गई है । ईश्वर की अनुभूति में प्रतिपल विभोर । जिसका मस्तिष्क, विवेक, स्वभाव, कर्म सभी ईश्वर के एकीकरण में हो गया है । वास्तव में मोंह का आच्छादन ही इन तमाम स्थितियों को दूर किये रहता है । मोंह का नाश होते ही यह सभी स्थितियाँ प्रगट हो जाती हैं । 

सोमवार, 30 जून 2014

कैवल्य

इस संसार से मुक्त । आत्मा जब मोंह से मुक्त हो जाय । इस संसार के साथ बँधा है मनुष्य इसी मोंह के द्वारा । मोंह से मुक्त आत्मा कैवल्य । लोकातीत परम् सत्य की स्थिति तक पहुँचना है मोंह से मुक्त आत्मा का अनुभव । मोंह से मुक्ति की स्थिति में द्वैत स्वत: समाप्त हो जाता है । मोंह से मुक्त आत्मा का परम् सत्य के साथ एकीकरण हो जाता है । इस स्थिति में प्रकृतीय गुणों की आसक्ति समाप्त हो जाती है । मुक्त स्वतंत्र आत्मा शांति की अनुभूति करता है । मुक्त आत्मा संसार के प्रक्रियाँओं में संलग्न होती है परंतु उनमें लिप्त नहीं होती है ।

रविवार, 29 जून 2014

योगा

मस्तिष्क की स्वतंत्र वृत्ति को विजय करना योगा है । इच्छाओं के लोक में भ्रमण करते मस्तिष्क को परम् सत्य के विधान के अनुरूप कार्य करने के लिये नियंत्रित करना योगा द्वारा सम्भव होता है । कार्य करते हुये कार्य के परिणाम से मोंह ना होना । यह योगा की मूल वाँक्षना है । सन्यास । कार्य के परिणाम से सन्यास । कार्य किया जाय । फल की लिप्सा ना रहे । इस अभ्यास से मस्तिष्क के उद्वेग शांत होते है । शांत मस्तिष्क प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण करता है । ज्ञान प्रगट हो जाता है । अज्ञेय ज्ञेय हो जाता है । 

शनिवार, 28 जून 2014

प्रकृति और पुरुष

जितना कुछ संसार दीख रहा है सब प्रकृति है । जो कुछ भी संसार में हो रहा है सब की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति जो कुछ भी कर रही है वह पुरुष के द्वारा ही सम्भव हो रहा है । पुरुष अदृष्य है अज्ञेय है । जो भी ज्ञान सम्भव है उसका माध्यम मस्तिष्क होता है । अज्ञेय को जानना ज्ञान है । इसलिये मस्तिष्क का नियंत्रित व संयमित संचालन ही ज्ञान पाने की सफलता है । यही रहस्य कुँजी है । इच्छाओं द्वारा मस्तिष्क दूषित होता है । ज्ञान सम्भव नहीं रह जाता है । 

शुक्रवार, 27 जून 2014

संकल्प विकल्प

मनुष्य मोंह से ग्रसित सदियों से जीवनयात्रा करता आया है । मस्तिष्क अपनी सामान्य क्रिया प्रणाली में अनेको विकल्प किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिये प्रस्तुत करता है । सामान्य अभ्यास में कोई भी उन्ही विकल्पों में से चुनाव कर कोई कार्य करने की प्रथा का अनुसरण कर चलता आया है । इसलिये जब उसे आध्यात्म को बताया जाता है, प्रकृति के कर्ता स्वरूप को बताया जाता है तो सहसा उसे लगता है कि अपनाने योग्य बाते हैं । परंतु जब उसे अपने सामान्य अभ्यास जिसके अंतर्गत वह अपने मस्तिष्क के द्वारा प्रस्तुत अनेकों विकल्पों में से चुनने का पथ त्याग प्रकृति की अपेक्षानुसार कर्म चुनने को कहा जाता है तो उसे लगता है कि हम तो शायद कहीं के नहीं रह जायेंगे । हम अपने दिमाग के मार्ग प्रस्ताव को कैसे त्याग दे । यह जो संकल्प विकल्प मस्तिष्क में उत्पन्न होता है जिससे वह अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाता है । यह बडी ही घातक स्थिति होती है । इसपर विजय सबसे पहला आवश्यक स्थल होता है । 

गुरुवार, 26 जून 2014

वास्तविक लक्ष्य

मनुष्य अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया को अनुभव कर सके, उसकी गरिमा के अनुरूप जीवन जी सके तो यह चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होगी । इसे पाने के लिये चाहे वह चिंतन व ध्यान का पथ अपनावे, चाहे प्रेम और समर्पण का पथ अपनावे अथवा कर्म फल से सन्यास को धारण कर कर्म करे सभी उपलब्धि काल में भिन्न पथ होते हुये भी अंतिम गंतब्य पर अनुभव होने वाली परम् सत्य की अनुभूति एक समान ही होगी । उपरोक्त तीनों ही विधायें आच्छादित करने वाले मोंह का ही निवारण करने को लक्षित हैं । इस प्रकार यदि कहा जाय कि परम् सत्य की अनुभूति यदि एक शरीर है तो ज्ञान इसके चक्छु हैं, स्नेह और प्रेम इसका हृदय है और सन्यास इसकी कर्म प्रणाली है । योगा जहाँ ध्यानऔर ज्ञान का प्रतीक है वहीं प्रेम और सेवा वह प्राचीन पथ है जिससे ज्ञान की मंजिल मिलती है । 

बुधवार, 25 जून 2014

आत्मनियंत्रित जीवन

आत्मा का विक्षेप मोंह जिसके हट जाने पर आत्मा परम् सत्य के सम्मुख शाश्वत् रूप में हो जाती है । इस शाश्वत् रूप में वह परम् सत्य की मर्यादा को समर्पित उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य में संलग्न होती है । इस स्तर के नियंत्रित जीवन में कोई कर्म बंधनकारी नहीं रह जाता है । मुक्त नियंत्रित आत्मा ही श्रेष्ठतम उपलब्धि होती है । इस स्थिति को पाने के लिये भक्ति और कर्म दोनों ही साधन के रूप में होते हैं । भावुक प्रकृति के लोगों के लिये भक्ति सुगम होती है । कर्मशील और आत्मविश्वासी लोगो के लिये कर्म पथ सुगमहोता है । आत्मनियंत्रित लोगों को ही ज्ञान मिलता है । 

मंगलवार, 24 जून 2014

यज्ञ की आहुति

इस कर्म प्रधान संसार में नियंत्रित मुक्त आत्माधारक व्यक्ति द्वारा बिना कर्मफल की आकाँक्षा से किया हुआ कर्म आहुति है । परम् सत्य के प्रयोजन हेतु एक यंत्रवत् कार्य में संलग्न होने वाले संत के द्वारा किया गया कर्म ही उस परम् सत्य की प्रतिष्ठा में अर्पित की गई आहुति होती है । कर्म प्रधान संसर ही यज्ञ स्वरूप है । 

सोमवार, 23 जून 2014

कर्मयोग

योग की मस्तिष्क की दशा में किये जाने वाला कर्म । यह साधन होता है आत्मा की मोंह से मुक्ति हेतु । कर्म मुक्ति नहीं है । कर्म को एक विषेस मानसिक दशा में करने का अभ्यास बनाने से साधक व्यक्ति की आत्मा मोंह के बंधन से मुक्ति पाती है । मुक्त व्यक्ति भी कर्म करता है । कर्म तो तब तक करना है जब तक जीवन है । परंतु मुक्त व्यक्ति का कर्म बंधनकारी नहीं होता । बंधन अर्थात एक कर्म के फल से दूसरे नये कर्म का उदय । यह कर्म बंधन है । एक कर्म किया और  वह कर्म वहीं पूर्ण । यह मुक्ति है । कर्मयोग मोहाशक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति का उपाय है । समस्त दु:ख कलह यह कर्म बंधन का फल है । शांति आनंद यह मुक्ति का फल है । प्रकृतीय गुणों का मोंह । सतगुण, रजोगुण, तमोंगुण इन्ही का मोंह बंधन है । इन तीनो को त्यागने वाला विरागी है । जिसने इन तीनों गुणों को त्यागा वही विरागी है । वही सुखी इंसान है ।  

रविवार, 22 जून 2014

साधना और लक्षणा

जीवन के सत्य को जानना । अपने अंदर विद्यमान उस परम् सत्य की छाया को जानना । यह दोनो ही एक दूसरे के पर्याय हैं । इस सत्य को जानने के लिये भक्ति और कर्म दो मार्ग है । ना ही भक्ति और ना ही कर्म कोई भी सत्य का रूप बोध नहीं हैं । यह दोनो ही साधन मात्र हैं । उस परम् सत्य को जानने के लिये । उसका ज्ञान हो जाने पर भी कर्म व्यक्ति करेगा । परंतु कर्म को दायित्व के रूप में नहीं करेगा बल्कि कर्म उसकी पहचान होगा । कर्म करने के लिये तो जन्म ही हुआ है । कर्म करने का निमित्त निर्धारित करता है कि कर्म बंधन को प्रशस्थ करने वाला है कि मुक्ति को । ज्ञानी का कर्म इच्छा की पूर्ति का नहीं अपितु कर्म के यंत्र के द्वारा किया हुआ कर्म होता है । ज्ञानी का कर्म साधना नहीं लक्षणा होता है ।  

शनिवार, 21 जून 2014

आत्मबोध का जीवन

हम प्रत्येक की वास्तविक पहचान हम प्रत्येक के अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया है । यदि कंचिद हम प्रत्येक उस परम् सत्य की अपने अंदर उपस्थिति को अनुभव कर सकें और उसकी मर्यादा के अनुकूल जीवन जी सकें तो यह वास्तविक स्वरूप होगा जिसमें वह हमसे अपेक्षा करता है । हम प्रत्येक उस परम् सत्य के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेंगे और इस व्यापक सृष्टि के वृहद् प्रयोजन के लिये प्रयोज्य होंगे । संकीर्ण स्वार्थ अथवा स्व-इच्छा की जेल से मुक्त हो सकेंगे । स्वार्थ और इच्छाओं की उपस्थिति यह इंगित करती है कि हम उस परम् सत्य की अपने अंदर उपस्थिति से अनभिज्ञ हैं । यह अज्ञान ही हमें संकीर्ण मोंह के बंधन में बाँधता है । इन समस्त व्याधियों से मुक्ति है अपने अंदर उस परम् सत्य की उपस्थिति का अनुभव करना । इस अनुभूति द्वारा हम संकीर्णता की कैद से मुक्त होकर व्यापक सत्य के लोक में जीवन जीयेंगे । हमें हर प्रत्येक प्राणी में वह परम् सत्य उपस्थित दिखाई देने लगेगा । हममें हर प्रत्येक के प्रति बंधुत्व का भाव जाग्रित होगा । 

शुक्रवार, 20 जून 2014

द्वैत से परे

जो मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूर्ण शून्य कर अपने को व्यापक प्रकृति के एक तुच्छ साधन के रूप में कार्य के लिये प्रस्तुत करता हैं वह मानों द्वैत से ऊपर ऊठ कर परम् सत्य के प्रयोजन का एक यंत्र बन जाता है । ऐसी स्थिति प्राप्त हो जाने पर कार्य के परिणाम उसकी मानसिक स्थिति को विचलित नहीं कर सकते हैं । वह कार्य करते हुये भी कार्य का कर्ता नहीं रह जाता है । द्वैत परम् सत्य व प्रकृति में होता है । प्रेरक परम् सत्य कर्ता प्रकृति कर्म को करने वाला एक यंत्र मात्र मानों द्वैत को स्वीकार कर द्वैत से परे हट कार्य में संलग्न है । उसका तो मात्र एक लक्ष्य है अपना धर्म । एक यंत्र के रूप में कर्ता । 

गुरुवार, 19 जून 2014

नियंत्रित प्रकृति

परम् सत्य की रचना प्रकृति उन्ही के पूर्ण नियंत्रण में इस सृष्टि का समस्त कार्यों को करने की कर्ता है । समस्त प्राणी प्रकृति की रचना हैं । प्रकृति के कर्मों को करने के साधन मात्र हैं । प्रकृति द्वारा आरोपित एवं अपेक्षित कर्मों को करना ही हमारी मर्यादा है । मर्यादा के अनुरूप कर्म करना ही हमारा धर्म है । मस्तिष्क में इच्छाओं का निवेश बाधित करता है प्रकृति की आज्ञा को जानने से । यदि प्रकृति की अपेक्षाओं को यथास्वरूप जानना है तो हमें अपनी इच्छाओं को पूर्ण नियंत्रित करना होगा । अन्यथा अपनी इच्छायें ही प्रकृति के आदेश का भ्रामक स्वरूप प्रगट करती रहेगी । हम अपने धर्म के विपरीत कार्यों में संलग्न होते ही रहेंगे । 

बुधवार, 18 जून 2014

आत्मज्ञान का साधन

कर्म अथवा भक्ति आत्मज्ञान के लिये साधन हैं । आत्मज्ञान स्वतंत्र अनुभूति है जो कि आत्मा पर आच्छादित मोंह का नाश होने पर ही मिलती है । परंतु इस आच्छादित करने वाले मोंह का नाश करने के लिये कर्म अथवा भक्ति साधन हैं । कर्म अथवा भक्ति आत्मज्ञान नहीं है । आच्छादित करने वाला मोंह होता बहुत बिकट है । यह व्याधी अनादिकाल से आत्मा को ग्रसित किये हुये होती है । इससे मुक्ति के लिये दृढ और सतत प्रयत्न की आवश्यकता होती है । इस प्रयत्न के लिये सही मानसिक स्थिति में कर्म करना अथवा पूर्णसमर्पण से भक्ति द्वारा मोंहको नाश करने का प्रयास उपलब्धि कराता है । 

मंगलवार, 17 जून 2014

समर्पित प्रतिनिधि

अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया का अनुभव । उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप जीवन । परम् सत्य ही समस्त कर्मों का प्रेरक है । इस सत्य को स्वीकार करके अपने को परम् सत्य के प्रयोजन के लिये एक यंत्र के रूप में उसे अर्पित करना । यही आदर्श अपेक्षित स्वरूप है । हम परम् सत्य के प्रयोजन के लिये एक समर्पित यंत्र हैं । यह जीवन का स्वरूप जो भी कोई बना सकेगा उसे अनुभव हो सकेगा परम् सत्य के चिर शांति का प्रसाद । उसके कर्म बंधनकारी नहीं होंगे । 

सोमवार, 16 जून 2014

आत्मचेतना

अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया की अनुभूति कर्म के माध्यम से करने के लिये अपने को उस परम् सत्य के यंत्र के रूप में प्रस्तुत करना होगा । अपने स्वभाव व बाह्य कर्म में एकरूपता पैदा करनी होगी । परम् सत्य बिलकुल अलौकिक अस्तित्व है । उसके अलौकिक गरिमा के अनुरूप हमें भी प्रकृतीय मोंह से अपने को मुक्त करना होगा । परम् सत्य की अपेक्षा के अनुरूप हमें उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप आचरण बनाना होगा । प्रतिपल यह स्मरण रखना होगा कि हमारे अंदर जो हमारी पहचान है वह वही परम् सत्य है । उसकी अपेक्षानुसार कर्म करने से कर्म बंधनकारी नहीं रह जावेंगे । 

रविवार, 15 जून 2014

पुरुषोत्तम का कर्म

पुरुषोत्तम कर्म करते हुये भी कर्म का कर्ता नहीं होता है । उसकी आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त होने के कारण कार्य को प्रेरित करती है परंतु कर्तापन के बोध से मुक्त रहती है । कार्य का प्रेरक परम् सत्य है । यह सत्य पुरुषोत्तम के मस्तिष्क में स्पष्ट स्थायी विद्यमान रहता है । योगेश्वर श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम थे । राजा जनक पुरुषोत्तम थे । पुरुषोत्तम कर्म करता है परंतु एक अज़नवी की भाँति । ना ही कर्म का निमित्त उसका है । ना ही कर्म का कारण उसका है । वह बस कर्म करता है । वह विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान की मर्यादानुसार कर्म करता है । पुरुषोत्तम का जीवन इसी प्रकृतीय ढाँचे में होता है परंतु इस प्रकृतीय शरीर के लिये नहीं होता है । वह इस संसार में रहता अवश्य है परंतु उसका जीवन परम् सत्य में लीन जीवन होता है । उसका कार्य होता तो वैसे ही है जैसे कि एक मोंहाशक्त का कार्य होता है परंतु उसमें मोंह नही होता है । 

शनिवार, 14 जून 2014

पुरुषोत्तम

आम मनुष्य इस प्रकृति निर्मित संसार में प्रकृतीय गुणों में मोहित इन्ही सांसारिक विषयों में लिप्त सुख दु:ख का भोग कर रहा है । जो मनुष्य परम् सत्य के अंश आत्मा में अपने को केंद्रित करता है वह ब्रम्ह की शांति में इस स्तर तक खो जाता है कि उसे आम जीवनके कोलाहल का भास नहीं रह जाता है । इन दोनो ही स्थितियों से परे एक ऐसे मनुष्य की कल्पना जो कि संसार के प्रत्येक दायित्व का निर्वाह करते संसार के विषयों में संलग्न रहते हुये भी किसी मोंह अथवा आसक्ति में नहीं बन्धता है । ऐसा सम्भव होता है उसके कार्य करने के विज्ञान के बल से । ऐसे मनुष्य को ही पुरुषोत्तम कहा जाता है । 

शुक्रवार, 13 जून 2014

निर्लिप्त कर्म

कर्म करने की सवतंत्रता है । कर्म फल में लिप्सा वर्जित है । मुक्ति और बंधन का विशाल भेद इसी उपरोक्त दो तथ्यों में निहित है । प्रकृति का संसार हर प्रत्येक प्रकार के कर्मों को सम्मुख किये हुये है । सभी कर्मों को मनुष्य ही कर रहा है । कोई कर्म हेय नहीं है । प्रकृति ने किस व्यक्ति को किस कर्म के लिये बनाया है यह प्रकृति ही जानती है । यदि हम प्रकृति की अपेक्षानुसार कर्म कर रहे हैं तो उस कर्म में मेरा कर्तापन तो है नही । हमतो मात्र एक यंत्र रूप में उसे कर रहे हैं । इसलिये उस कर्म के अच्छे बुरे के साथ मेरा नाम सम्बद्ध करना औचित्यपूर्ण नहीं होगा । यही स्वरूप चरितार्थ करना अपेक्षित होता है । यही मुक्ति है । उस कर्म के कर्तापन में सम्मलित ना हुआ जाय । कर्ता तो प्रकृति है । हमतो मात्र उस प्रकृति के एक यंत्र हैं । जब प्रकृति जैसा करा रही है हम कर रहे हैं । 

गुरुवार, 12 जून 2014

कर्तव्य कर्म


आम जीवन का अभ्यास इच्छाजनित कर्मों को करने का है । इसलिये उपरोक्त वृतांत सहसा विश्वसनीय नहीं प्रतीत होगा । परंतु उपरोक्त वृतांत इतना सत्य है जितना की सूर्य का प्रकाश । यह बात सिद्धांतरूप में समझकर जीवन में इसका सत्य अनुभव स्वयँ करें तो अधिक सार्थक परिणाम प्रगट होगा । प्रकृति की अपेक्षा ही हमारा कर्तब्य है । यह इच्छाओं के विद्यमान रहते प्रगट नहीं होता है । इच्छाओं के शून्य होने पर इसका स्वच्छ स्वरूप विदित होगा । 

बुधवार, 11 जून 2014

कर्तव्य कर्म

जो संत अपनी इच्छाओं को पूर्णरूप से नियंत्रित कर चुका है । जो कर्म को यंत्रवत् करता है । जो कि परम् सत्य का प्रतिनिधि बन गया है । उसके लिये प्रकृति की अपेक्षा ही उसका कर्तब्य स्वरूप हो जाता है । उसके लिये कर्म के फल का कंचिद कोई महत्व रह ही नहीं जाता ।

आम जीवन का अभ्यास इच्छाजनित कर्मों को करने का है । इसलिये उपरोक्त वृतांत सहसा विश्वसनीय नहीं प्रतीत होगा । परंतु उपरोक्त वृतांत इतना सत्य है जितना की सूर्य का प्रकाश । यह बात सिद्धांतरूप में समझकर जीवन में इसका सत्य अनुभव स्वयँ करें तो अधिक सार्थक परिणाम प्रगट होगा । प्रकृति की अपेक्षा ही हमारा कर्तब्य है । यह इच्छाओं के विद्यमान रहते प्रगट नहीं होता है । इच्छाओं के शून्य होने पर इसका स्वच्छ स्वरूप विदित होगा । 

मंगलवार, 10 जून 2014

मुक्ति

कर्मों की कर्ता प्रकृति है । कर्मों का प्रेरक आत्मा है । इस सत्य की मर्यादा को समझते हुये यदि कोई कर्म करता है तो उसके कर्म बंधन नहीं होंगे । बंधन सदैव इच्छाओं की पूर्ति में किये गये कर्मों द्वारा ही सम्भव है । कर्म के परिणाम से दूसरे नये कर्म की उत्पत्ति । जब प्रेरक आत्मा कर्ता प्रकृति के कर्मों को ही प्रेरित करेगा तो उसे कर्म के फल से कोई सरोकार नहीं होगा । परिणामत: कर्मबंधनकारी नहीं रह जावेगा । 

सोमवार, 9 जून 2014

कर्म के यंत्र

यदि कंचिद हमारी शरीर, इंद्रियाँ, विवेक, मस्तिष्क एक यंत्र के रूप में कर्ता प्रकृति के कर्मों को करने वाले बनजाते हैं तो अभीष्ट स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं । परम् सत्य की अपेक्षा के अनुरूप । अनंतकाल से हम सभी परिणाम की भ्रमात्मक अपेक्षा के पीछे अपनी समस्त ऊर्जा व्यय करते आये हैं । इस भ्रम से उबरना ही लक्ष्य की प्राप्ति होगी । एक कर्म के परिणाम से दूसरे नये कर्म का उदय होता ही जावेगा । इसका कहीं अंत नहीं है । जिस पल इस भ्रम को पहचान जायेंगे और अपने को परम् सत्य के प्रयोजन की पूर्ति का यंत्र बना देंगे तत्काल ही मुक्त हो जावेंगे । कार्य के परिणाम की कोई रूचि नहीं रह जावेगी । प्रेरक भी वही है । प्रयोजन भी उसी का है । हमको परिणाम से क्या काम । हमतो मात्र सेवक हैं । सेवा मेरा धर्म है । अपेक्षित दायित्व निर्वाह ही सम्पूर्ण लक्ष्य है । इस स्थिति को पाने के लिये केवल त्यागना है स्वयँ की इच्छाओं को । अपने को उस परम् सत्य के प्रयोजन का यंत्र बना देना ही लक्ष्य करना योग्य प्रयत्न है । 

रविवार, 8 जून 2014

परम् सत्य के प्रतिनिधि

परम् सत्य को अपने को समर्पित कर आप परम् सत्य के दिव्य रूप को प्राप्त कर लेते हैं । आप के कर्म परम् सत्य के कार्य हो जाते हैं । आप का मस्तिष्क, इंद्रियाँ, विवेक सभी उस परम् सत्य के प्रयोजन के यंत्र बन जाते हैं । आपके कर्म परम् सत्य के प्रयोजन को प्रगट करने वाले बन जाते हैं । परम् सत्य के वृहद प्रयोजन के आप एक सूक्ष्म अंश के रूप में आपका व्यक्तित्व हो जाता है । यह संसार परम् सत्य का एक वृहद प्रयोजन हैं जिसमें उन्होने प्रत्येक एकाकी व्यक्ति को किसी प्रयोजन विशेस के लिये रखा है । यदि हम आप उस परम् सत्य के उस विशेस प्रयोजन को पूर्ण करते हैं तो ही हमारे आपके जीवन का सही प्रयोग है । स्वयँ की इच्छाओं की पूर्ति में किये जाने वाले कर्मों की कोई मान्यता नहीं होती । इन्हे पूर्णरूप से त्यागना ही श्रेयस्कर है । 

शनिवार, 7 जून 2014

कर्तव्य का अंत

वह संत पुरुष जिसकी समस्त इच्छायें समाप्त हो चुकी हैं उसका इच्छागत कर्तब्य दायित्व समाप्त हो जाता है । ऐसा संत अपने जीवनकाल पर्यंत कार्य तो करेगा परंतु उसका कोई कर्तब्य दायित्व नहीं होगा । उसका समस्त कार्य परम् सत्य की कर्म प्रेरणा द्वारा उसकी सेवा में होगा । इस स्थल पर ज्ञातब्य है कि कोई भी व्यक्ति जिसभी कर्म को अपना कर्तब्य दायित्व बताता है वह उसकी अपनी इच्छाओं की पूर्ति में ही होता है । जिस संत की इच्छायें नियंत्रित हो गई उसका समस्त कार्य परम् सत्य की सेवा में उसी द्वारा पैदा की गई प्रेरणा द्वारा होता है । यह एकाकी की अनंत में पूर्ण समर्पण की स्थिति होती है । इसका उद्देष्य परम् सत्य के प्रयोजन में अपने को अर्पित करना है । इस स्थिति के संत के किसी कर्म में किसी दोष की सम्भावना शेस नहीं रह जाती है । कर्म बंधनकारी नहीं रह जाता है । 

शुक्रवार, 6 जून 2014

सत्य स्वरूप

ज्ञान का जो स्वरूप विगत अनेको अंकों में लिखा जाता रहा है । उसकी एक अलग छवि । इस सृष्टि में जो भी कर्म किये जा रहे हैं उनकी कर्ता प्रकृति है । सृष्टि का समस्त विस्तार प्रकृति है । प्रकृति परम् सत्य की रचना है उत्पत्ति है । समस्त कर्मों के प्रेरक परम् सत्य स्वयं हैं । आत्मा परम् सत्य का अंश है । इस सृष्टि में नित्यकर्ता है । यह तथ्य आत्मसात् होना ही ज्ञान है । ज्ञान होना ही शांति की उपलब्धि है । आनंद है । 

गुरुवार, 5 जून 2014

चर्मोत्कर्ष सरलता

कर्म प्रेरणा का श्रोत - इच्छा का पूर्णमर्दन एक ऐसे शांत सरल शून्य स्थिति को सृजित करने वाला होता है जिसमें कर्ता व्यक्ति का कोई कर्म दायित्व शेस नहीं रह जाता है । ऐसे संत को कोई कर्म करने की कोई अभिलाषा शेस नहीं रह जाती है और ना ही किसी फल को पाने की कोई आकाँक्षा ही रह जावेगी । ऐसा कर्मयोगी उस परम् सत्य में समाहित जीवन जीता है । उसका अपना अलग कोई अस्तित्व नहीं शेस रह जाता है । वह पूर्णरूप से उस परम् सत्य का प्रतिनिधि बनकर समस्त कर्म करता है । उसका कोई भी कर्म उसका अपना नहीं होता अपितु वह परम् सत्य के आदेश को कर्म में रूपांतरित करता है । यह स्वरूप अपने को पूर्णरूप से परम् सत्य को अर्पित करना है । पूर्णसमर्पण । पूर्णविलय । चरमोत्कर्ष सरलता ।  

बुधवार, 4 जून 2014

कर्म के स्वामी

कर्म और उसके स्वाभाविक फल भोग की सामान्य प्रक्रिया को आमूल समाप्त कर निरापद यथावाँक्षित कर्म करते हुये अपने कर्म के स्वामी बन सकते हैं । ऐसा करने में रंचमात्र परम् सत्य के कार्य विधान में किसी हस्तक्षेप की कोई सम्भावना नहीं होगी और समस्त कर्म अपने स्वाभाविक क्रम में गतिमान रहेंगे । ऐसा करने में कर्ता व्यक्ति का सीधा सम्बंध उस अखण्ड कर्ता शक्ति के साथ होगा जो समस्त सृष्टि के कर्मों की कर्ता है । कर्ता व्यक्ति का कर्म उस अखण्ड शक्ति के कर्म का प्रतिनिधित्व करने वाला होगा । ऐसे में कर्म बंधनकारी नहीं होंगे । कर्म और कर्मों का फल भोगने के लिये अगला जन्म यह प्रक्रिया इसी वर्तमान जन्म में समाप्त किया जा सकता है यदि कंचिद हम अपने कर्मों के स्वामी बन जाँय । यह समस्त उपलब्धि लम्बित है मात्र कर्म करते हुये कर्म फल की इच्छा से विरक्ति और किये जाने वाले कर्म को परम् सत्य को अर्पित करते हुये कर्म करने की धुरी पर । 

मंगलवार, 3 जून 2014

शाश्वत् सत्य

शाश्वत् परम् सत्य जो कि अपरिवर्तनीय चिर सत्य है वह किसी परिवर्तनशील क्षणभँगुर कर्म द्वारा नहीं जाना या पाया नहीं जा सकता है । परंतु कर्म आधार तैयार करता है जिससे परम् सत्य को पाया जा सके । मुक्ति ज्ञान से ही सम्भव होती है । परंतु ज्ञान सही धारणा के बिना नहीं सम्भव होगा । इसलिये सही धारणा के लिये सही मानसिक स्थिति में प्रभु को समर्पित कर्म करना परम् आवश्यक वाँक्षना है । इस प्रकार प्रभु को समर्पित भाव से किया गया कर्म यज्ञ की आहुति के समान हो जाता है । यह अपने अस्तित्व को प्रभु के दिव्य अस्तित्व को अर्पित करने के तुल्य होता है । ऐसे कर्म द्वारा मस्तिष्क पवित्र होता है । कर्म बंधनकारी नहीं रह जाते 

सोमवार, 2 जून 2014

ज्ञान द्वारा मुक्ति

अज्ञान ही बंधन है । सत्य स्थिति का ज्ञान ना होना अज्ञान है । अज्ञान के प्रभाव से बंधन होता है । मोंह में बंधन । उपरोक्त समस्त का विलोम । सत्य स्थिति की जानकारी होना ही ज्ञान  है । ज्ञान का प्रादुर्भाव ही अज्ञान का नाश है । अज्ञान के नाश से सम्भव होगी मुक्ति । मोंह से मुक्ति । सत्य एक ही है । उस सत्य को समर्पित होना ही मुक्ति है । प्रत्येक कर्म को उसी सत्य को समर्पित कर करें । प्रत्येक कर्म को उसी सत्य की सेवा समझ कर करे । प्रत्येक कर्म को उसी सत्य का आदेश रूप में ग्रहण कर करें । यही अभ्यास मुक्ति का पथ है । 

रविवार, 1 जून 2014

व्याधि और निदान

यदि कंचिद किसी कार्य करने की पद्धति से शत्रुता है तो यह शत्रुता कार्य से नहीं है अपितु कार्य द्वारा निर्वाण उपलब्ध करने की प्रक्रिया से है । सत्य का ज्ञान पाने के लिये सत्य स्थिति से अनभिज्ञता सबसे प्रबल शत्रु होता है । अज्ञान यदि कंचिद मूल व्याधि है तो इस व्याधि का एकमात्र सरताज इलाज़ ज्ञान है । अपरिवर्तनीय सत्य का ज्ञान परिवर्तनशील कार्य द्वारा नहीं सम्भव हो सकता है । सही मन:दशा द्वारा कर्म के अभ्यास द्वारा सत्य के ज्ञान का आधार निर्मित होता है।  

शनिवार, 31 मई 2014

चिर सन्यासी

जो मनुष्य कार्य के परिणाम की अपेक्षा किये बिना काम करने का अभ्यास सृजित करता है और कार्य को कर्ता प्रकृति को समर्पित कर कार्य का अभ्यास अपना आम अभ्यास बनाता है वह चिर सन्यासी होता है । वह प्रत्येक स्थिति को वह जिसभी रूप में प्रगट होती हैं ग्रहण करता है । वह किसी भी स्थिति को बिना किसी पश्च्याताप के छोड आगे प्रवृत्त होता है । उसे ना ही किसी प्रगट होने वाली स्थिति से कोई अपेक्षा होती है और ना ही किसी विगत स्थिति से कोई ग्लानि ही होती है । 

शुक्रवार, 30 मई 2014

कर्म द्वारा पूर्णता

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोहाशक्त अर्जुन को बताया कि कर्म करते हुये भी मनुष्य जीवन की पूर्णता की आदर्श स्थिति पायी जा सकती है । इस उपलब्धि के लिये उसे प्रकृति द्वारा आदेशित कार्यों को करते हुये अपनी मानसिक स्थिति को इसप्रकार नियंत्रित रखना होगा कि कार्य के परिणाम के प्रति कोई आसक्ति ना रहे ।

प्रकृति के गुणों में मोहाशक्ति के आच्छादन की उपस्थिति ही पूर्णता की स्थिति का बाधक होती है । इस व्याधि का निवारण कर्म द्वारा यदि लक्षित किया जाय तो सम्भवतया यह सबसे सरल निदान होगा । कार्य जिसे मनुष्य प्रतिपल करता है । इसलिये उसे सुधार का अवसर प्रतिपल मिलेगा । इसप्रकार यह सभी अन्य उपायों की अपेक्षा अधिक प्रभावी परिणामपोषक होगी ।  

गुरुवार, 29 मई 2014

अर्जुन का मोंह

अर्जुन ने महसूस किया कि युद्ध करके उसे अपने ही स्वजनों को मारना है जो कि राज्य की अभिलाषा के अधीन उसके सामने उसके शत्रु के रूप में उपस्थित हुये हैं । उसका मोंह उसके मस्तिष्क में व्याप्त मानसिक उद्वेगों से पैदा हुआ विचार था । उसे ऐसा लगा कि इन स्वजनो की हत्या कर यदि हम राज्य पाते भी हैं तो राज्य का सुख इन स्वजनों की हत्या से कलंकित होगा । वेदनाकारक होगा । ऐसी अनुभूति कंचिद हर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी ना किसी रूप में उपस्थित होती है । मनुष्य अपने ही मस्तिष्क में व्याप्त मोंह के अधीन जीवन जीते उसी मोंह को अपना जानने लगता है । यही अज्ञान का जीवन उसकी आसक्ति बन जाती है । जब इसे त्यागने की बात आती है तो उसे लगता है कि जैसे कुछ बहुत ही प्रिय को त्यागना है । परंतु यदि मोंह को नहीं त्यागेगे तो और अधिक मोंह में फसते जायेगे । अपने कर्तव्य दायित्व का निर्वाह नहीं कर सकेंगे । यदि इस स्थिति से उबरना है तो सत्य को जानना होगा । सत्य को अपनाना होगा । यदि ऐसा करेगे तो आनंद की स्थिति तक पहुँचेगे । मस्तिष्क में व्याप्त मोंह ही हम सभी के जीवन का रूप बना हुआ है । यही हमें अपने कर्तव्य से च्युत करता है । इसे पहचानना होगा । इसे त्यागना होगा । सत्यनिष्ठ व्यक्तित्व विकसित कर शांत दिव्य आनंद का भोग मिलेगा । 

बुधवार, 28 मई 2014

श्रीमद् भागवद गीता

कुरू वंश में दो भाई थे पाण्डु और धृतराष्ट्र । धृतराष्ट्र जन्म से अंधा था । इसके सौ पुत्र थे कौरव । इन सौ पुत्रो का विकास लालच, ईर्ष्या, घृणा, अहंकार के विचारो से प्रेरित हुआ था । पाण्डु के पाँच पुत्र थे । इनका विकास सद् विचारों के महौल में हुआ था । पाण्डु राजा थे । उनकी मृत्यु हो गई । धृतराष्ट्र ने राज्य का उत्तराधिकारी होने का दावा किया । इनको दुष्ट रिश्तेदारों का समर्थन भी प्राप्त था । कृष्ण ने मध्यस्थता की और प्रयत्न किया कि बातों के द्वारा समस्या का समाधान निकल सके । परंतु ऐसा सम्भव नहीं हुआ । युद्ध द्वारा उत्तराधिकार निर्धारित होने का फैसला हुआ । महाभारत का युद्ध । इस युद्ध को लडने के लिये दोनों पक्ष की सेनायें एकत्रित हुई । पाण्डु के पुत्रों में धनुर्धारी महायोद्धा अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में विशाद हुआ और वह युद्ध लडने से विमुख हुये । श्रीकृष्ण ने उन्हे उनके मस्तिष्क में उत्पन्न हुये मोंह को बताया और उन्हे सत्य ज्ञान को बताया । श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परामर्श दिया कि वह मस्तिष्क में व्याप्त मोंह का नाश ज्ञान की तलवार से करे और अपने कर्तव्य रूपी युद्ध को लडे । अर्जुन ने कृष्ण के परामर्श को समझा और स्वीकारा और अपने मस्तिष्क में आच्छादित मोंह पर विजय कर पुन: अपने दायित्व को पूर्ण निर्वाह करने के रूप में युद्ध लडने के लिये तत्पर हुये । यही मस्तिष्क को आच्छादित करने वाले मोंह और सत्य स्थिति का ज्ञान श्रीमद् भागवद गीता का धर्म दर्शन है । इस मोंह का नाश कैसे किया जाय और सत्य ज्ञान द्वारा कैसे कर्तव्य निर्वाह किया जाय यह पथ प्रशस्थ करता है श्रीमद् भागवद गीता का धर्मदर्शन । 

मंगलवार, 27 मई 2014

मोंह शत्रु है

मनुष्य अपने कर्तव्य दायित्व से मोंह के अधीन च्युत होता है । मोंह इंद्रीय वासनाँओं के अधीन भी होता है और सत्य का ज्ञान ना होने से भी होता है । अपने कर्तव्य दायित्व से बिमुख होना मनुष्य के अस्तित्व को ही प्रश्नवाचक बनाने के तुल्य होता है । मोंह का नाश सत्य के ज्ञान द्वारा तथा अपनी वासनाओं के नियंत्रण द्वारा सम्भव होता है । यदि हमारे अंदर घृणा का जन्म होता है तो यह हमारी आत्मिक पराजय है । कर्तव्य का स्वरूप शाश्वत होता है । मस्तिष्क की सही दशा हमें मोंह से उबरने का पथ प्रदान करती है । 

सोमवार, 26 मई 2014

संयमित मस्तिष्क

कर्मों को करते हुये कर्मों के बंधन से मुक्त हुआ जा सकता है । इसके लिये अपने दायित्व के कर्मों को करते समय पूर्ण समर्पण के साथ पूर्ण निष्ठा से बिना कर्म फल के साथ कोई मानसिक संकल्प धारणकिये हुये कर्म किया जाय । कर्म प्रकृति द्वारा अपेक्षित और आदेशित होना चाहिये । उपरोक्त समस्त उपलब्धि मस्तिष्क के संयमित आचरण से ही सम्भव हो सकती हैं । 

रविवार, 25 मई 2014

मस्तिष्क

यह अत्यंत वैज्ञानिक यंत्र है । यह समस्त कर्मों का नियंत्रक होता है । इसलिये इसकी यथास्थिति कर्म की गुणवत्ता का निर्धारण करने वाली होती है । मोंह से ग्रसित मस्तिष्क त्रुटिपूर्ण कर्मों को प्रेरित करने को उद्यत होता है । इच्छाओं के पूर्ति के भ्रम में किये जाने वाले कर्म मस्तिष्क के मोंह की वृद्धि करने वाले होते हैं । जीवन में शांति होगी अथवा कलह होगी यह पूर्णतया मस्तिष्क की दशा का फल होगा । इच्छाओं के तूफान यदि मस्तिष्क में चलते रहेंगे तो दु:ख और कलह ही उपलब्धि होगी । इसके विपरीत मस्तिष्क की शांत दशा उत्कर्ष की ओर अग्रसर होना है । कर्म द्वारा चरित्र निर्माण के विचार में शांत मस्तिषक सर्वाधिक महत्व का होता है ।   

शनिवार, 24 मई 2014

कुरु क्षेत्र

जिस कुरू क्षेत्र का श्रीमद् भागवद् गीता में वृतांत है वह हम प्रत्येक का अपना मस्तिष्क ही है । इसमें सद् विचार स्वरूप पाण्डव व दुर्विचार स्वरूप कौरव बसते हैं । उत्तराधिकार का प्रश्न सामाजिक रूप से प्रचलित वंश की मर्यादानुसार प्रतिस्थापन की विधा से भिन्न व्यक्ति अपने अंदर विद्यमान सद् विचार अथवा दुर्विचार किसे प्रफुल्लित होने हेतु कर्म करता है उस पर आधारित उसका व्यक्तित्व विकसित होगा । आवश्यक नहीं कि जिसके पूर्व के कर्म भ्रम पर आधारित थे तो वह ज्ञान पाने के लिये उद्यत नहीं हो सकता है । यह हर प्रत्येक मनुष्य के अपने मस्तिष्क के अंदर का साम्राज्य उसकी अपनी धरोहर होती है । इसमें परम् सत्य की मर्यादा को जान उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप कर्म करने को उद्यत होने पर जीवन विकसित व्यक्तित्व की ओर उन्मुख होता है । इस संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से आदर्श के अनुरूप नहीं होता है । परंतु सही पथ से कर्म कर जीवन को उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये । 

शुक्रवार, 23 मई 2014

भ्रम

पहले तो इच्छा पैदा होती है । इस इच्छा की पूर्ति के उद्देष्य से किये जाने वाले कर्म में एक निष्चित फल की कामना मस्तिष्क में बसी रहती है । यही भ्रम का स्वरूप होता है । इस भ्रम के वशीभूत जो भी कर्म किया जावेगा वह बंधनकारी होगा । किसी भी कर्म को करने में किसी फल विषेस की कामना रखना यह भ्रम है । इस भ्रम के ग्रसित कार्य चाहे प्रगटरूप से स्वार्थ की पूर्ति के लिये ना होकर परमार्थ को ही लक्षित क्यों ना होवे वह बंधनकारी होगा । उस कर्म के परिणाम के आधार पर कर्ता व्यक्ति अगले कर्म को करने को बाध्य होगा । 

गुरुवार, 22 मई 2014

सन्यास

कर्म के प्रभाव द्वारा उत्पन्न होने वाला कर्मफल । कर्मफल के प्रभाव से किये जाने वाला नया कर्म । कर्म श्रँखला में बँधना बंधन है । इस बंधन से मुक्ति का विचार । विश्लेषणात्मक अध्ययन यह प्रगट करता है कि बंधन मात्र कर्म करने से नहीं पैदा होता है । बंधन की जड होती है कर्म करने के निमित्त में । कर्म करने का निमित्त यदि इच्छाओं की पूर्ति के आधार पर है तो निश्चय ही उस कर्म के फल के आधार पर वह कर्ता व्यक्ति नये कर्म करेगा । प्रकृति सतत कार्य करती है । इसलिये यदि कोई कार्य से सन्यास का लक्ष्य करेगा तो वह प्रकृति के कोप का भोगी बनेगा । इसलिये योग्य विचार यह है कि कार्य किये जाँय परंतु कार्य को करने की प्रेरणा ग्रहण करने में विचारशील रहा जाय । यही धर्मदर्शन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोहाशक्त अर्जुन को बताया  

बुधवार, 21 मई 2014

मुक्ति और बंधन

हर प्रत्येक मनुष्य जो भी कर्म करता है उसका कोई फल होता है । इन्ही कर्मों के फल द्वारा दूसरे अन्य कर्म वह करता है । इस प्रकार फलों के प्रभाव से वह नये कर्म करने के लिये बँधता जाता है । इस बंधन से मुक्त होने का विचार आने पर प्रथम सरलतम् उपाय प्रतीत होता है सन्यास । सभी कर्मों को करने से अपने को वँचित रखना । परंतु सन्यास इस संसार की रचना के उद्देष्य के विपरीत है । इस संसार की उत्पत्ति कर्म करने के लिये हुई है । इस संसार की समस्त गति कर्म द्वारा है । इसलिये सन्यास ग्राह्य विचार नहीं है । कर्म किया जाय परंतु किसी ऐसी विधि द्वारा किया जाय जिससे करने वाला कर्मफल के बंधन में ना पडे । सिद्धांतरूप में यह योग्य विकल्प प्रतीत होता है । हिंदू धर्मदर्शन इस मत की पुष्टि करता है । यही व्यवहारिक ग्राह्य मत है ।  

मंगलवार, 20 मई 2014

भक्ति का रूप

जब भक्त परम् सत्य पर पूर्णरूप से समर्पित हो जाता है । परम् सत्य ही उस भक्त के मस्तिष्क की प्रबलतम भाव जाग्रित प्रेम बन जाता है । ऐसे में फिर भक्त जो कुछ भी करता है अपने ईष्ट परम् सत्य की महिमा में ही करता है । भक्ति अपने को पूर्णरूप से परम् सत्य को अर्पित करने का ही रूप है । यह परम् सत्य पर विश्वास करने, उन्हे प्यार करने, उन्हे समर्पित होने, उसी परम् सत्य में समा जाने को ही भक्ति कहा जाता है । भक्ति अपनी भावनाओं का ही फल होती है । भक्त परम् सत्य की अनुभूति करते उनकी सेवा के लिये स्फूर्ति से भरा होता है । 

सोमवार, 19 मई 2014

प्रभु की सेवा

भक्त का एकमात्र लक्ष्य होता है प्रभु की सेवा । भक्त का एकमात्र साधन है प्रेम । भक्त प्रेयसी प्रेम की अभिव्यक्ति में चाहे प्रभु के चरण धोये अथवा उनकी आरती करे उसका एक ही भाव प्रगट होता है प्रभु की सेवा । प्रभु की सेवा ही मानो भक्त के जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाता है । प्रभु के आदेश का सेवाभाव से पालन ही भक्त के जीवन का एकमात्र उपलब्धि बन जाती है । भक्त के लिये प्रभु ही एकमात्र अवलम्ब हैं जिनके ऊपर समस्त संसार आश्रित है । भक्त ऐसे सक्षम प्रभु के साथ अपने को सम्बद्ध अनुभव करके उनके गुणगान करते उन्ही की स्मृति में विभोर हो नाचता है । प्रभु पर पूर्णरूप से समर्पित । 

रविवार, 18 मई 2014

प्रपत्ति ज्ञानरूप

मनुष्य के अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया का बोध ज्ञान है । भक्ति ज्ञान को पाने का मार्ग प्रशस्थ करती है । जब भक्ति प्रज्वलित होती है तो मनुष्य के अंदर विद्यमान आत्मा का उज्जवल प्रकाश भक्त को ज्ञान से प्रकाशित करता है । भक्त अपने अंदर परम् सत्य को विद्यमान अनुभव करता है और अपने को परम् सत्य के अंदर निवास करता हुआ अनुभव करता है । भक्त परम् सत्य के साथ सम्बद्ध अनुभव करता है । भक्त प्रहलाद कहते हैं कि मनुष्य के लिये उच्चतम आदर्श स्थिति है कि वह परम् सत्य को पूर्णरूप से निक्षावर हो जाय । इसी भावना को पोषित करते हुये प्रपत्ति ज्ञान का प्रगट रूप है । 

शनिवार, 17 मई 2014

प्रपत्ति के चरण

प्रपत्ति का पूर्ण स्वरूप विकसित होने में (1) अनुकूलस्य संकल्प: - सभी के प्रति सद्भाव (2) प्रतिकूलस्य वर्जनं दुर्भावना वर्जित (3) रक्षिस्याति विस्वास: - प्रभु रक्षा करेगा में अडिग विश्वास (4) गोपतृत्व वर्णं प्रभु की ओर रक्षा के विश्वास से घूमना (5) कार्पण्यम् असहाय का अहसास (6) आत्मनिक्षेप: - पूर्ण आत्मसमर्पण । इन छ: चरणों में अंतिम चरण ही लक्षित उपलब्धि होती है । शेस पाँच चरण मंजिल पाने की क्रमबद्ध स्थितियाँ हैं । 

शुक्रवार, 16 मई 2014

प्रभु की कृपा

भक्ति द्वारा प्रभु की कृपा पाने के लिये कुछ यत्न तो अवश्य ही करना होता है । प्रपत्ति में प्रभु की कृपा प्रभु के द्वारा स्वत: प्रदान की जाती है । यह प्रश्न अनादिकाल से विचारणीय रहा है कि प्रभु की कृपा क्या अपने प्रयत्नों से मिलती है अथवा प्रभु स्वयं कृपालु होकर कृपा सुलभ करा देते हैं । केवल हिंदू धर्म में ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों में भी यह विचार का विषय रहा है । अधिकतर विद्वान महात्माओं का यही मानना रहा है कि प्रभु स्वयं कृपालु होकर अपनी कृपा मोहैय्या करा देते हैं । जिन भाग्यशाली लोगों को प्रभु की कृपा का सुअवसर मिल जाता है वह ही प्रभु के दिव्यरूप का दर्शन भी पाते हैं और उनके अमृतमय जीवन का सुखभोग भी पाते है । इन विद्वान महात्माओं की मान्यता का आधार इस सत्य में निहित है कि पाप प्रत्येक प्राणी द्वारा होता है । पाप का स्वरूप ऐसा है कि कोई प्राणी इससे बच नहीं सकता है । इसके बावज़ूद भी कुछ लोगो की उपलब्धि प्रभु के कृपा की होती है । निश्चय ही यह प्रभु की कृपा द्वारा ही सम्भव होती है । यह प्रभु का न्याय है कि वह किसे अपनी कृपा के लिये चुनते हैं ।