मंगलवार, 1 जुलाई 2014

सधर्म्य

मोंह से मुक्त आत्मा परम् सत्य के स्वरूप में विलीन होकर पूर्ण ईश्वरीय भोग में यापन करती है । ईश्वर स्वरूप में मनुष्य जीवन । ईश्वर की प्रेरणा से ईश्वर के कार्यों को करती है । आत्मा का ईश्वर में विलय हो जाता है । वह ईश्वर का रूप धारण कर लेती है । ईश्वर में एकीकृत स्वरूप । जितात्मन:, युक्तचेतसा, ऐसी आत्मा जो ईश्वर की अनुभूति से ईश्वरमय हो गई है । ईश्वर की अनुभूति में प्रतिपल विभोर । जिसका मस्तिष्क, विवेक, स्वभाव, कर्म सभी ईश्वर के एकीकरण में हो गया है । वास्तव में मोंह का आच्छादन ही इन तमाम स्थितियों को दूर किये रहता है । मोंह का नाश होते ही यह सभी स्थितियाँ प्रगट हो जाती हैं । 

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