मनुष्य अपने कर्तव्य दायित्व से
मोंह के अधीन च्युत होता है । मोंह इंद्रीय वासनाँओं के अधीन भी होता है और सत्य
का ज्ञान ना होने से भी होता है । अपने कर्तव्य दायित्व से बिमुख होना मनुष्य के
अस्तित्व को ही प्रश्नवाचक बनाने के तुल्य होता है । मोंह का नाश सत्य के ज्ञान
द्वारा तथा अपनी वासनाओं के नियंत्रण द्वारा सम्भव होता है । यदि हमारे अंदर घृणा
का जन्म होता है तो यह हमारी आत्मिक पराजय है । कर्तव्य का स्वरूप शाश्वत होता है
। मस्तिष्क की सही दशा हमें मोंह से उबरने का पथ प्रदान करती है ।
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