अपने अंदर तमस और रजस को समाप्त
करने के लिये हम सत्व का सहारा लेते हैं । परंतु सत्व में भी हम अहंकार से मुक्त नहीं
होते हैं । मात्र हमारी इच्छायें और कर्म कुछ अपेक्षाकृत परिमार्जित विचारों के
लिये हो जाते हैं । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य को पहचानने के लिये हमें अपने
अहंकार को पूर्ण समाप्त करना होगा । हमारे आत्मा को परम् सत्य के प्रदर्षित रूप के
समान परिमार्जित करना होगा । हम उस परम् सत्य के प्रगट रूप हैं । इस स्वरूप में बन
जाना होगा । इस स्वरूप में अहंकार का कहीं कोई अस्तित्व रह ही नहीं जावेगा । अस्तित्व
तो मात्र परम् सत्य का ही होगा ।
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