उत्थान की प्रकृया मानसिक विचारों
के संघर्ष को विजय करते हुये ही सम्भव होती है । संघर्ष उन मानसिक विचारो से जो
हमें बंधन की ओर प्रवृत्त करते हैं । स्थापित करना लक्षित होता है उन विचारों को
जो हमें मुक्ति की ओर अग्रसर करते हैं । बंधन वाले कर्मों को हम सतत जन्मों से
करते आये हैं । उन्हे करना हमारा सहज़ अभ्यास है । मुक्ति को अग्रसर कर्म पहले तो
हम जाने । फिर उन्हें करने की विधा से भिज्ञ होंवे । फिर ऐसे कर्मों को करना अपना
आम अभ्यास बनावें । इस समस्त प्रक्रिया से पूर्व मस्तिष्क में एक संघर्ष स्वाभाविक
है । आम अभ्यास को छोड एक नये विशिष्ट को अपनाना । जो इस संघर्ष को विजय कर मुक्ति
के पथ पर प्रवृत्त होता है । उसे मिलता है आनंद ।
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