रविवार, 20 जुलाई 2014

एक संशय

इच्छाओं की पूर्ति में कर्म करने का हर प्रत्येक मनुष्य का जन्मों से अभ्यास बना हुआ है । इसलिये जब उसे सुझाव मिलता है कि योग की अवस्था में कर्म करने का अभ्यास मुक्तिदायक है तो अति स्वाभाविक क्रम में वह एक प्रश्नवाचक संशय को प्राप्त होता है । उसे होता है कि अभी हम अपना लाभ हानि सोचकर अपना काम करते हैं । कहीं हम योग का प्रयत्न करें और यदि ना सफल हुये तो हम दोनों से गये । ना ही हम अपने लाभ-हानि के अनुरूप कार्य किये और ना ही हम योग के सुझाव के अनुसार आत्मिक प्रधानता का ही कार्य कर सकें । फिर तो हम पूर्ण असफल ही हो जावेंगे । इस संशय को लेकर मस्तिष्क अशांत हो जाता है । वह पूर्ण अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाता है । यद्यपि कि यह संशय निराधार होता है ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण मोहाशक्त अर्जुन को बताते हैं कि जो मनुष्य अपनी भावना और कर्म में साश्वत् है उसे कभी दु:ख की छाया भी नहीं मिल सकती है । कोई भी सत्कर्म करने वाला किसी भी बुराई को नहीं प्राप्त हो सकता है । यह प्रकृति की व्यवस्था द्वारा है । इसका कोई अपवाद नहीं होता है ।   

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