इच्छाओं की पूर्ति में कर्म करने
का हर प्रत्येक मनुष्य का जन्मों से अभ्यास बना हुआ है । इसलिये जब उसे सुझाव
मिलता है कि योग की अवस्था में कर्म करने का अभ्यास मुक्तिदायक है तो अति
स्वाभाविक क्रम में वह एक प्रश्नवाचक संशय को प्राप्त होता है । उसे होता है कि
अभी हम अपना लाभ हानि सोचकर अपना काम करते हैं । कहीं हम योग का प्रयत्न करें और
यदि ना सफल हुये तो हम दोनों से गये । ना ही हम अपने लाभ-हानि के अनुरूप कार्य
किये और ना ही हम योग के सुझाव के अनुसार आत्मिक प्रधानता का ही कार्य कर सकें ।
फिर तो हम पूर्ण असफल ही हो जावेंगे । इस संशय को लेकर मस्तिष्क अशांत हो जाता है
। वह पूर्ण अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाता है । यद्यपि कि यह संशय निराधार होता
है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण मोहाशक्त
अर्जुन को बताते हैं कि जो मनुष्य अपनी भावना और कर्म में साश्वत् है उसे कभी दु:ख
की छाया भी नहीं मिल सकती है । कोई भी सत्कर्म करने वाला किसी भी बुराई को नहीं
प्राप्त हो सकता है । यह प्रकृति की व्यवस्था द्वारा है । इसका कोई अपवाद नहीं
होता है ।
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