प्रकृति की मंशा मानवमात्र को सत्य
के ज्ञान से युक्त करना एवं उस सत्य की मर्यादानुसार प्रत्येक मनुष्य का आचरण
विकसित करना है । संसार की समस्त प्रक्रियाँये पूर्वनिर्धारित संचालन नहीं है
अपितु सत्य को जानकर सत्य की अपेक्षानुसार कर्म करने का लक्ष्य निर्धारित कर कर्म
द्वारा हो रहीं है । मोंह ही हमारा अज्ञान है । जिस क्षण हम मोंह को काट प्रकृति
के कर्तापन को स्वीकार कर कर्म में उद्यत होते हैं हम अपने सत्य स्वरूप में
स्थापित हो जाते हैं । हमें कर्म के फल की कामना नहीं रह जाती है । मनुष्य का जन्म
ही इसी उद्देष्य से हुआ है कि वह जन्मदेने वाले की मंशा के अनुरूप कर्म करे । हमें
अपनी भावनाओं पर विजय करना होगा, अपने अंदर विद्यमान भ्रम का नाश करना होगा, अपने कर्मों को नियंत्रित करना होगा अन्यथा हम मोंह के शिकार हो जावेंगे और
फिर कर्मफल का पीछा करने लगेंगे ।
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