शनिवार, 14 जून 2014

पुरुषोत्तम

आम मनुष्य इस प्रकृति निर्मित संसार में प्रकृतीय गुणों में मोहित इन्ही सांसारिक विषयों में लिप्त सुख दु:ख का भोग कर रहा है । जो मनुष्य परम् सत्य के अंश आत्मा में अपने को केंद्रित करता है वह ब्रम्ह की शांति में इस स्तर तक खो जाता है कि उसे आम जीवनके कोलाहल का भास नहीं रह जाता है । इन दोनो ही स्थितियों से परे एक ऐसे मनुष्य की कल्पना जो कि संसार के प्रत्येक दायित्व का निर्वाह करते संसार के विषयों में संलग्न रहते हुये भी किसी मोंह अथवा आसक्ति में नहीं बन्धता है । ऐसा सम्भव होता है उसके कार्य करने के विज्ञान के बल से । ऐसे मनुष्य को ही पुरुषोत्तम कहा जाता है । 

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