पुरुषोत्तम कर्म करते हुये भी कर्म
का कर्ता नहीं होता है । उसकी आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त होने के कारण कार्य को
प्रेरित करती है परंतु कर्तापन के बोध से मुक्त रहती है । कार्य का प्रेरक परम्
सत्य है । यह सत्य पुरुषोत्तम के मस्तिष्क में स्पष्ट स्थायी विद्यमान रहता है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम थे । राजा जनक पुरुषोत्तम थे । पुरुषोत्तम कर्म
करता है परंतु एक अज़नवी की भाँति । ना ही कर्म का निमित्त उसका है । ना ही कर्म का
कारण उसका है । वह बस कर्म करता है । वह विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान की
मर्यादानुसार कर्म करता है । पुरुषोत्तम का जीवन इसी प्रकृतीय ढाँचे में होता है
परंतु इस प्रकृतीय शरीर के लिये नहीं होता है । वह इस संसार में रहता अवश्य है
परंतु उसका जीवन परम् सत्य में लीन जीवन होता है । उसका कार्य होता तो वैसे ही है
जैसे कि एक मोंहाशक्त का कार्य होता है परंतु उसमें मोंह नही होता है ।
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