यह अत्यंत वैज्ञानिक यंत्र है । यह
समस्त कर्मों का नियंत्रक होता है । इसलिये इसकी यथास्थिति कर्म की गुणवत्ता का
निर्धारण करने वाली होती है । मोंह से ग्रसित मस्तिष्क त्रुटिपूर्ण कर्मों को
प्रेरित करने को उद्यत होता है । इच्छाओं के पूर्ति के भ्रम में किये जाने वाले
कर्म मस्तिष्क के मोंह की वृद्धि करने वाले होते हैं । जीवन में शांति होगी अथवा
कलह होगी यह पूर्णतया मस्तिष्क की दशा का फल होगा । इच्छाओं के तूफान यदि मस्तिष्क
में चलते रहेंगे तो दु:ख और कलह ही उपलब्धि होगी । इसके विपरीत मस्तिष्क की शांत
दशा उत्कर्ष की ओर अग्रसर होना है । कर्म द्वारा चरित्र निर्माण के विचार में शांत
मस्तिषक सर्वाधिक महत्व का होता है ।
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