बुधवार, 4 जून 2014

कर्म के स्वामी

कर्म और उसके स्वाभाविक फल भोग की सामान्य प्रक्रिया को आमूल समाप्त कर निरापद यथावाँक्षित कर्म करते हुये अपने कर्म के स्वामी बन सकते हैं । ऐसा करने में रंचमात्र परम् सत्य के कार्य विधान में किसी हस्तक्षेप की कोई सम्भावना नहीं होगी और समस्त कर्म अपने स्वाभाविक क्रम में गतिमान रहेंगे । ऐसा करने में कर्ता व्यक्ति का सीधा सम्बंध उस अखण्ड कर्ता शक्ति के साथ होगा जो समस्त सृष्टि के कर्मों की कर्ता है । कर्ता व्यक्ति का कर्म उस अखण्ड शक्ति के कर्म का प्रतिनिधित्व करने वाला होगा । ऐसे में कर्म बंधनकारी नहीं होंगे । कर्म और कर्मों का फल भोगने के लिये अगला जन्म यह प्रक्रिया इसी वर्तमान जन्म में समाप्त किया जा सकता है यदि कंचिद हम अपने कर्मों के स्वामी बन जाँय । यह समस्त उपलब्धि लम्बित है मात्र कर्म करते हुये कर्म फल की इच्छा से विरक्ति और किये जाने वाले कर्म को परम् सत्य को अर्पित करते हुये कर्म करने की धुरी पर । 

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