गुरुवार, 17 जुलाई 2014

सत्य में विलय

आत्मा परम् सत्य का ही अंश है । इसकी प्रकर्ति के साथ आसक्ति इसके स्वाभाविक स्वरूप का विभ्रंश है । द्वैत पुरुष और प्रकृति में है । परिवर्तनशील प्रकर्ति में अपरिवर्तनीय सत्य की आसक्ति आत्मा की गरिमा का नाश है । इस तथ्य का जब भी बोध हो जाय और विषेस प्रयत्नों द्वारा आत्मा को विजातीय की आसक्ति से मुक्त करा उसे स्वतंत्र मूल स्वरूप में वापस लाया जाय तो यह प्रक्रिया परम् सत्य में विलय के तुल्य होगा । आत्मा को परम् सत्य ने व्यापक प्रयोजन हेतु प्रकृति के मध्य रखा है । इसका प्रयोग निज़ी स्वार्थ की पूर्ति अथवा व्यक्तिगत यश अर्जित करने के उद्देष्य से करना इसका दुरुपयोग है । 

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