मनुष्य मोंह से ग्रसित सदियों से
जीवनयात्रा करता आया है । मस्तिष्क अपनी सामान्य क्रिया प्रणाली में अनेको विकल्प
किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिये प्रस्तुत करता है । सामान्य अभ्यास में कोई भी
उन्ही विकल्पों में से चुनाव कर कोई कार्य करने की प्रथा का अनुसरण कर चलता आया है
। इसलिये जब उसे आध्यात्म को बताया जाता है, प्रकृति के कर्ता स्वरूप को बताया
जाता है तो सहसा उसे लगता है कि अपनाने योग्य बाते हैं । परंतु जब उसे अपने
सामान्य अभ्यास जिसके अंतर्गत वह अपने मस्तिष्क के द्वारा प्रस्तुत अनेकों
विकल्पों में से चुनने का पथ त्याग प्रकृति की अपेक्षानुसार कर्म चुनने को कहा जाता
है तो उसे लगता है कि हम तो शायद कहीं के नहीं रह जायेंगे । हम अपने दिमाग के
मार्ग प्रस्ताव को कैसे त्याग दे । यह जो संकल्प विकल्प मस्तिष्क में उत्पन्न होता
है जिससे वह अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाता है । यह बडी ही घातक स्थिति होती है
। इसपर विजय सबसे पहला आवश्यक स्थल होता है ।
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