इस कर्म प्रधान संसार में
नियंत्रित मुक्त आत्माधारक व्यक्ति द्वारा बिना कर्मफल की आकाँक्षा से किया हुआ
कर्म आहुति है । परम् सत्य के प्रयोजन हेतु एक यंत्रवत् कार्य में संलग्न होने
वाले संत के द्वारा किया गया कर्म ही उस परम् सत्य की प्रतिष्ठा में अर्पित की गई
आहुति होती है । कर्म प्रधान संसर ही यज्ञ स्वरूप है ।
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