हर प्रत्येक मनुष्य जो भी कर्म
करता है उसका कोई फल होता है । इन्ही कर्मों के फल द्वारा दूसरे अन्य कर्म वह करता
है । इस प्रकार फलों के प्रभाव से वह नये कर्म करने के लिये बँधता जाता है । इस
बंधन से मुक्त होने का विचार आने पर प्रथम सरलतम् उपाय प्रतीत होता है सन्यास ।
सभी कर्मों को करने से अपने को वँचित रखना । परंतु सन्यास इस संसार की रचना के
उद्देष्य के विपरीत है । इस संसार की उत्पत्ति कर्म करने के लिये हुई है । इस
संसार की समस्त गति कर्म द्वारा है । इसलिये सन्यास ग्राह्य विचार नहीं है । कर्म
किया जाय परंतु किसी ऐसी विधि द्वारा किया जाय जिससे करने वाला कर्मफल के बंधन में
ना पडे । सिद्धांतरूप में यह योग्य विकल्प प्रतीत होता है । हिंदू धर्मदर्शन इस मत
की पुष्टि करता है । यही व्यवहारिक ग्राह्य मत है ।
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