वस्तुत: परम् सत्य और प्रकृति यह
दो आधारभूत अवयव हैं जिनसे सारा संसार बना है । दोनों ही पूर्णतया भिन्न होते हुये
भी इस प्रकार सयुँक्त है प्रत्येक स्वरूप में कि इनको अलग करके दो अलग स्वरूपों
में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है । मनुष्य के जीवन को विचारणीय होने पर प्रश्न
यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इनमें से किस अवयव की वरीयता को ग्रहण कर जीवन जीया
जाय । समस्त धर्मदर्शन यह अनुमोदित करता है कि परम् सत्य के प्रधानता को ग्रहण कर
जीवन जीना उत्तम पथ है । बाधा क्या होती है कि समस्त संसार पूर्णरूप से प्रकृति की
वर्चस्व से संचालित हो रहा है । इसलिये धर्मदर्शन की अनुशंसा अनुसार पथ चुनने पर
विषेस कठिन स्थितियों से उबरना पडता है । इसीलिये दृढता अनिवार्य वाँक्षना बन जाती
है । इन तथ्यों से भिज्ञ रहते हुये चुनाव करना सही निर्णय प्रशस्थ करेगा ।
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