मंगलवार, 8 जुलाई 2014

उत्तरोत्तर प्रगति

परम् सत्य अपने स्वरूप में अनंत, एकाकी, किसी दूसरे स्वरूप में विलय ना होने वाला और अपने में ही आनंदित रहंने वाला है । प्रकृतीय रचनाओं में परस्पर विरोधी स्वरूप और गुण प्रगट हुये हैं जो कि परम् सत्य को छिपा देने में समर्थ होते हैं । वर्तमान सृष्टि की समस्त रचनाओं में पाँच स्तर पाये जाते हैं । अन्न, प्राण, मनस, विज्ञान और आनंद । यह उत्तरोत्तर विकास है । मनुष्य चौथे स्तर विज्ञान श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है । इसे अभी आनंद की श्रेणी पाना शेस है । यह उपलब्धि सत्य का ज्ञान होने, सत्य के विधान के अनुरूप जीवन जीने से सम्भव होगी । यह स्थिति प्राप्त होने पर वह इस संसार की चर्मोत्कर्ष स्थिति को भोग करेगा । 

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