शनिवार, 21 जून 2014

आत्मबोध का जीवन

हम प्रत्येक की वास्तविक पहचान हम प्रत्येक के अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया है । यदि कंचिद हम प्रत्येक उस परम् सत्य की अपने अंदर उपस्थिति को अनुभव कर सकें और उसकी मर्यादा के अनुकूल जीवन जी सकें तो यह वास्तविक स्वरूप होगा जिसमें वह हमसे अपेक्षा करता है । हम प्रत्येक उस परम् सत्य के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेंगे और इस व्यापक सृष्टि के वृहद् प्रयोजन के लिये प्रयोज्य होंगे । संकीर्ण स्वार्थ अथवा स्व-इच्छा की जेल से मुक्त हो सकेंगे । स्वार्थ और इच्छाओं की उपस्थिति यह इंगित करती है कि हम उस परम् सत्य की अपने अंदर उपस्थिति से अनभिज्ञ हैं । यह अज्ञान ही हमें संकीर्ण मोंह के बंधन में बाँधता है । इन समस्त व्याधियों से मुक्ति है अपने अंदर उस परम् सत्य की उपस्थिति का अनुभव करना । इस अनुभूति द्वारा हम संकीर्णता की कैद से मुक्त होकर व्यापक सत्य के लोक में जीवन जीयेंगे । हमें हर प्रत्येक प्राणी में वह परम् सत्य उपस्थित दिखाई देने लगेगा । हममें हर प्रत्येक के प्रति बंधुत्व का भाव जाग्रित होगा । 

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