गुरुवार, 31 जुलाई 2014

पहचान की बाधा

मनुष्य द्वारा अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया की पहचान उसे नहीं मिल पाती है । इस अल्पता का मुख्य कारण (1) उसकी प्रकृतीय गुणों के प्रति मोंह (2) इंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना (3) अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया के प्रति अचेत मस्तिष्क की दशा (4) इच्छाजनित कार्यों को करने का अभ्यास होता है । इसलिये यदि कोई जीवन की चर्मोत्कर्ष उत्कृष्ठ आनंद स्थिति को अनुभव करने और उसी आनन्द की स्थिति को अपने जीवन का सत्य स्वरूप /-ा*े*-ो*-9999999े-्+ट होना चाहे तो उसे उपरोक्त चार बाधाओं को विजय करना लक्ष्य करना होगा । बाधाओं के हटने पर परम् सत्य का दर्शन आपको अपने अंदर मिल जावेगा ।+-+* 

बुधवार, 30 जुलाई 2014

संघर्ष

उत्थान की प्रकृया मानसिक विचारों के संघर्ष को विजय करते हुये ही सम्भव होती है । संघर्ष उन मानसिक विचारो से जो हमें बंधन की ओर प्रवृत्त करते हैं । स्थापित करना लक्षित होता है उन विचारों को जो हमें मुक्ति की ओर अग्रसर करते हैं । बंधन वाले कर्मों को हम सतत जन्मों से करते आये हैं । उन्हे करना हमारा सहज़ अभ्यास है । मुक्ति को अग्रसर कर्म पहले तो हम जाने । फिर उन्हें करने की विधा से भिज्ञ होंवे । फिर ऐसे कर्मों को करना अपना आम अभ्यास बनावें । इस समस्त प्रक्रिया से पूर्व मस्तिष्क में एक संघर्ष स्वाभाविक है । आम अभ्यास को छोड एक नये विशिष्ट को अपनाना । जो इस संघर्ष को विजय कर मुक्ति के पथ पर प्रवृत्त होता है । उसे मिलता है आनंद । 

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

मोंह

आत्मा प्रकृति के मध्य रहकर, प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होते हुये सहज़ रूप से प्रकृतीय गुणों और इंद्रीय वासनाओं की आसक्ति जनित कर लेती है । इसी व्यापक आसक्ति को एक शब्द में व्यक्त करने के लिये मोंह शब्द का प्रयोग किया जाता है । यह जटिल व्याधि है । रोगग्रस्त को दुसह अशांति और कलह प्रदान करने वाली होती है । इस व्याधि के विद्यमान रहते मनुष्य और अधिक मोंह में बँधता चला जाता है । इसके कुप्रभाव से बचने का मात्र एक उपाय होता है विद्यमान मोंह को निर्मूल करना । इस उपलब्धि के लिये कोई बाहरी औषधि अथवा विधा सहायक नहीं हो सकती । आत्मचेतना को जाग्रित करना ही एकल पथ है । दृढ प्रयत्न द्वारा मोंह नाश होता है । प्रतिफल स्वरूप आनंद प्राप्त होता है । 

सोमवार, 28 जुलाई 2014

प्रकृति का आच्छादन

इच्छा के रूप में प्रकृति का आच्छादन किस सीमा तक परम् सत्य की मनुष्य में विद्यमान छवि को धूमिल किये रहती है इसका सही आँकलन व अनुभूति तभी सम्भव होती है जब विषेस प्रयत्नों के द्वारा इस आच्छादन को समाप्त किया जाता है । इस आच्छादन के प्रभाव से जीवन का स्वरूप आनंद से विछुड कलह तक किस प्रकार पहुँच जाता है यह प्रकृति का विज्ञान है । सहज़ रूप से बिना विचारे जीवन यापन में सामन्य प्रक्रिया के अंतर्गत मोंह का आच्छादन ही एक मात्र उपलब्धि होती है । विवेक के प्रयोग से जाग्रित आत्मचेतना के द्वारा आनंद का पथ प्रशस्थ होता है । परम् सत्य के चिंतन, परम् सत्य को समर्पण, व परम् सत्य की अपेक्षानुसार उन्ही की शक्ति से समस्त कार्यों का सम्पादन के द्वारा आच्छादित मोंह का नाश सम्भव होता है । 

रविवार, 27 जुलाई 2014

रचना का विज्ञान

समस्त प्रकृतीय रचना में निहित विज्ञान ही इस समस्त संसार के स्वरूप, गति, गंतव्य का श्रोत है । यह अद्भुद विज्ञान ही प्रेरक आत्मा को बाँधे हुये भी है । उसकी सेवा के सहारे समस्त कर्मों को सम्पादित भी कराता है । जबकि आत्मा प्रकृति का शासक है । प्रकृति के ग़ुण ही प्रकृति की शक्ति है । इन्ही गुणों के मोंह में पडकर आत्मा शासक होते हुये भी दास बनकर रह जाता है । यह समस्त मात्र रचना के विज्ञान के प्रभाव से सम्भव हो जाता है । इसीलिये यदि प्रकृति के मोंह की जेल से  शासक आत्मा को मुक्त कराना है तो (1) या तो आत्मा, प्रकृति और मोंह तीनो के ज्ञाता बनिये (2) या प्रकृति को आत्मसमर्पण करिये (3) या नियंत्रित कर्म करिये । आत्मा मोंह से मुक्त हुये बिना और अधिक मोंह में बँधता ही जायेगा । कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं । अंधकार का नाश प्रकाश से ही सम्भव है । कोई दूसरा उपाय नही होता है ।  

शनिवार, 26 जुलाई 2014

प्रकृति का स्वरूप

समस्त दृष्य संसार प्रकृति है । प्रकृति ही मूल अवयव भी है, प्रकृति ही स्वरूप भी है, प्रकृति ही विस्तार भी है, प्रकृति ही संचार भी है, प्रकृति ही प्राण भी है । प्रकृति ही बंधन है । प्रकृति ही कर्ता है । प्रकृति ही समस्त स्वरूप में निहित विज्ञान भी है । समस्त शक्तियों से युक्त होते हुये भी प्रकृति प्रेरक नहीं है । प्रकृति का स्वरूप यदि ग्राह्य हो जाय तो जीवन यापन सुगम हो जाय । प्रकृति के स्वरूप की अंधता ही समस्त भ्रमजाल में भटकना है । ज्ञानी पुरुष प्रकृति को सदैव समर्पित भाव से आदर करता है । उसकी कृपा की याचना करता है । उसके आदेश को नतमस्तक हो शिरोधार्य करता है । जीवन क्लिष्टताओं से मुक्त होगा तो शांति की उपलब्धि होगी । शांति सत्कर्मों के लिये मूल आधार है । 

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

नियतिवाद और स्वतंत्रता

कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन पर हमारा कोई वश नहीं होता है । जैसे हमारा जन्म किन परिस्थितियों में, किस देश में, किस माता पिता के द्वारा हुआ इसपर हमारा कोई वश नहीं होता है । इसे पूर्व नियत कहा जा सकता है । परंतु हम क्या कार्य करेंगे क्या नहीं करेंगे यह मेरे निर्णय के अधीन होता है । किसी एक व्यक्ति को जन्म अच्छे परिवारिक परिवेश में नहीं हुआ परंतु वह सही कर्मों के चुनाव द्वारा उत्कृष्ठ सामाजिक स्थितियों को पाता है । इसके विपरीत एक व्यक्ति का जन्म उत्कृष्ठ पारिवारिक परिवेश में हुआ परंतु वह गलत कर्मों के चयन के फलस्वरूप अपने समस्त प्राप्त वैभव को खो बैठता है । इसप्रकार नियतवाद और स्वतंत्रता का संतुलन पूर्णरूप से जीवन को व्यवहृत करने के ऊपर निर्भर करता है । सही चयन द्वारा जीवन यापन करने पर नियतवाद को पूर्ण नियंत्रित किया जा सकता है । अपनी स्वतंत्रता का सही प्रयोग । 

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

चयन

वस्तुत: परम् सत्य और प्रकृति यह दो आधारभूत अवयव हैं जिनसे सारा संसार बना है । दोनों ही पूर्णतया भिन्न होते हुये भी इस प्रकार सयुँक्त है प्रत्येक स्वरूप में कि इनको अलग करके दो अलग स्वरूपों में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है । मनुष्य के जीवन को विचारणीय होने पर प्रश्न यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इनमें से किस अवयव की वरीयता को ग्रहण कर जीवन जीया जाय । समस्त धर्मदर्शन यह अनुमोदित करता है कि परम् सत्य के प्रधानता को ग्रहण कर जीवन जीना उत्तम पथ है । बाधा क्या होती है कि समस्त संसार पूर्णरूप से प्रकृति की वर्चस्व से संचालित हो रहा है । इसलिये धर्मदर्शन की अनुशंसा अनुसार पथ चुनने पर विषेस कठिन स्थितियों से उबरना पडता है । इसीलिये दृढता अनिवार्य वाँक्षना बन जाती है । इन तथ्यों से भिज्ञ रहते हुये चुनाव करना सही निर्णय प्रशस्थ करेगा । 

बुधवार, 23 जुलाई 2014

निरंकार

जल के समुद्र में डूबे रहिये परंतु जल से अछूता रहिये । आत्मा प्रकृति के मध्य में रहे परंतु प्रकृति से अछूता रहे । निरंकार । भगवान शंकर को निरंकार बताया जाता है । माता पार्वती तो सदैव उनके साथ रहती हैं । उनके दो पुत्र भी बताये जाते हैं । परंतु निरंकार की श्रेणी में वह शिरोमणि माने जाते हैं । यह ऐसा concept है जो कि यदि समझ में आ जाय तो मानो सर्व ज्ञान मिल गया । प्रकृति में रखा गया । प्रकृति के गुणों का भोक्ता बनाया गया । यह सब मनुष्य ने स्वयं तो रचा नहीं । यह तो ब्रम्ह ने ही रचा । -परंतु अपेक्षा भी रखी । निरंकार । प्रकृति में रहना । प्रकृति के गुणों का भोग भी करना । परंतु प्रकृति से अछूता रहना । जो इस रहस्य को समझ सके । वही ज्ञानी । जो इस रहस्य को अपने जीवन में जी सके । वही आनंद को जाने । निरंकार । भगवान के शहस्त्र नाम । फिर भी निरंकार । भक्त निरंकार । 

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

दिव्य जन्म और कर्म

मनुष्य के मस्तिष्क में प्रकृतीय रचना और विज्ञान के प्रभाव द्वारा सात्विक और तामसिक दोनो ही प्रकार के विचार भाव सृजित होते हैं । इनमें से हितोपियोगी विचारभाव को जानना, कलुषित भ्रमात्मक विचारभाव से मुक्ति पाना, ही जीवन की सफलता है । परम् सत्य के अंश आत्मा का अनुभव पाना, आत्मा की गरिमा के अनुरूप जीवन जीना ही सार्थकता है । दिव्य जन्म है । समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है और प्रेरक स्वयं परम् सत्य हैं । इस विचार भाव को ग्रहण कर किये जाने वाले कर्म दिव्य कर्म होते हैं । दिव्य जन्म होने पर दिव्य कर्म को करने वाली आत्मा का परम् सत्य में विलय हो जाता है । क्योंकि पुनर्जन्म तो मोहाशक्त आत्मा का होता है । मानो प्रकृति मोहाशक्त आत्मा को मोंह से मुक्त होने के लिये बार बार अवसर देती  है । 

सोमवार, 21 जुलाई 2014

अहंकार का नाश

अपने अंदर तमस और रजस को समाप्त करने के लिये हम सत्व का सहारा लेते हैं । परंतु सत्व में भी हम अहंकार से मुक्त नहीं होते हैं । मात्र हमारी इच्छायें और कर्म कुछ अपेक्षाकृत परिमार्जित विचारों के लिये हो जाते हैं । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य को पहचानने के लिये हमें अपने अहंकार को पूर्ण समाप्त करना होगा । हमारे आत्मा को परम् सत्य के प्रदर्षित रूप के समान परिमार्जित करना होगा । हम उस परम् सत्य के प्रगट रूप हैं । इस स्वरूप में बन जाना होगा । इस स्वरूप में अहंकार का कहीं कोई अस्तित्व रह ही नहीं जावेगा । अस्तित्व तो मात्र परम् सत्य का ही होगा । 

रविवार, 20 जुलाई 2014

एक संशय

इच्छाओं की पूर्ति में कर्म करने का हर प्रत्येक मनुष्य का जन्मों से अभ्यास बना हुआ है । इसलिये जब उसे सुझाव मिलता है कि योग की अवस्था में कर्म करने का अभ्यास मुक्तिदायक है तो अति स्वाभाविक क्रम में वह एक प्रश्नवाचक संशय को प्राप्त होता है । उसे होता है कि अभी हम अपना लाभ हानि सोचकर अपना काम करते हैं । कहीं हम योग का प्रयत्न करें और यदि ना सफल हुये तो हम दोनों से गये । ना ही हम अपने लाभ-हानि के अनुरूप कार्य किये और ना ही हम योग के सुझाव के अनुसार आत्मिक प्रधानता का ही कार्य कर सकें । फिर तो हम पूर्ण असफल ही हो जावेंगे । इस संशय को लेकर मस्तिष्क अशांत हो जाता है । वह पूर्ण अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाता है । यद्यपि कि यह संशय निराधार होता है ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण मोहाशक्त अर्जुन को बताते हैं कि जो मनुष्य अपनी भावना और कर्म में साश्वत् है उसे कभी दु:ख की छाया भी नहीं मिल सकती है । कोई भी सत्कर्म करने वाला किसी भी बुराई को नहीं प्राप्त हो सकता है । यह प्रकृति की व्यवस्था द्वारा है । इसका कोई अपवाद नहीं होता है ।   

शनिवार, 19 जुलाई 2014

सत्य का ज्ञान

प्रकृति की मंशा मानवमात्र को सत्य के ज्ञान से युक्त करना एवं उस सत्य की मर्यादानुसार प्रत्येक मनुष्य का आचरण विकसित करना है । संसार की समस्त प्रक्रियाँये पूर्वनिर्धारित संचालन नहीं है अपितु सत्य को जानकर सत्य की अपेक्षानुसार कर्म करने का लक्ष्य निर्धारित कर कर्म द्वारा हो रहीं है । मोंह ही हमारा अज्ञान है । जिस क्षण हम मोंह को काट प्रकृति के कर्तापन को स्वीकार कर कर्म में उद्यत होते हैं हम अपने सत्य स्वरूप में स्थापित हो जाते हैं । हमें कर्म के फल की कामना नहीं रह जाती है । मनुष्य का जन्म ही इसी उद्देष्य से हुआ है कि वह जन्मदेने वाले की मंशा के अनुरूप कर्म करे । हमें अपनी भावनाओं पर विजय करना होगा, अपने अंदर विद्यमान भ्रम का नाश करना होगा, अपने कर्मों को नियंत्रित करना होगा अन्यथा हम मोंह के शिकार हो जावेंगे और फिर कर्मफल का पीछा करने लगेंगे । 

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

कर्म द्वारा आत्मज्ञान

हम सभी का कर्म फल की कामना से कर्म करने का अभ्यास बना हुआ है । परंतु जिस पल हम कर्म को कर्म फल की कामना के बगैर करना शुरू करते हैं तत्काल ही अनुभव आता है कि हम जैसे चिर प्रतीक्षित सही पथ को पा गये हैं । मानो अपने अंदर विद्यमान आत्मा की अनुभूति इन्ही इच्छा जनित कर्मों द्वारा ही ढकी हुई थी । फल की कामना के भ्रम में किये जाने वाले कर्म हमें अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा के अपने अनुभव को हमसे दूर किये रहते हैं । इस अनुभूति के ना होने से हम अपने सत्य स्वरूप से ही अनभिज्ञ रहते हैं । इस प्रकार आत्मा का अनुभव पाने के लिये हमारे लिये सरलतम उपाय है कि हम कर्मफल की इच्छा के बिना ही कर्म करने का अभ्यास सृजित करें । 

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

सत्य में विलय

आत्मा परम् सत्य का ही अंश है । इसकी प्रकर्ति के साथ आसक्ति इसके स्वाभाविक स्वरूप का विभ्रंश है । द्वैत पुरुष और प्रकृति में है । परिवर्तनशील प्रकर्ति में अपरिवर्तनीय सत्य की आसक्ति आत्मा की गरिमा का नाश है । इस तथ्य का जब भी बोध हो जाय और विषेस प्रयत्नों द्वारा आत्मा को विजातीय की आसक्ति से मुक्त करा उसे स्वतंत्र मूल स्वरूप में वापस लाया जाय तो यह प्रक्रिया परम् सत्य में विलय के तुल्य होगा । आत्मा को परम् सत्य ने व्यापक प्रयोजन हेतु प्रकृति के मध्य रखा है । इसका प्रयोग निज़ी स्वार्थ की पूर्ति अथवा व्यक्तिगत यश अर्जित करने के उद्देष्य से करना इसका दुरुपयोग है । 

बुधवार, 16 जुलाई 2014

सही का चुनाव

मुक्ति और बंधन का विचार केवल मनुष्य योनि के लिये है । परम् सत्य सदैव मुक्त है । वनस्पति और जानवर इस परिधि में आते ही नहीं हैं । मनुष्य यदि केवल वंश परम्परा से प्राप्त गुणों से संचलित होता तो नैतिकता का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता । सत्य और असत्य का ज्ञान होने के बाद क्या उचित होगा का चुनाव करना यह विवेक का विषय है । यह विवेक जब सही स्वरूप में जाग्रित होता है तभी कोई उत्थान के पथ पर अग्रसर हो सकेगा । गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोंह से ग्रसित अर्जुन को सत्य और मोंह दोनो का स्वरूप बताने के बाद अर्जुन को अपनाने के लिये चुनाव करने को कहते हैं । यह अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थल होता है । 

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

आत्ममय प्रकृति

आत्मचेतना की वह सीमा जहाँ शरीर की प्रकृति पूर्णरूप से आत्मा के बोध से संतृप्त हो जाय । शरीर की प्रकृति आत्मा के भाव से ओतप्रोत हो जाय । आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो स्वतंत्र है । मोंहजनित आवश्यकतायें आत्मा की स्वतंत्रता से पूर्णरूप से पराजित हो चुकी होंवे । यह आत्मा की प्रकृति पर विजय है । आत्मा प्रकृतीय मोंह में बँधकर प्रकृति का दास बन जाता है । आत्मा की मोंह पर विजय उसकी स्वतंत्रता है । यह स्वतंत्रता इतनी बढ जाय कि मानों प्रकृति को आगे आत्मा को अपने मोंह में बाधने की मंशा ही नहीं रह जाय । सम्पूर्ण प्रकृति ही आत्ममय हो जाय । 

सोमवार, 14 जुलाई 2014

सत्य और क्षणभँगुर

परिवर्तनशील के मोंह में जब तक अपरिवर्तनशील आसक्त है तब तक वह बंधन में है । जब अपरिवर्तनशील परिवर्तनशील के क्षणभँगुरता का अनुभव कर अपने अपरिवर्तनशील स्वरूप की गरिमा को अनुभव कर लेता है तो वह मोंह से मुक्त हो परम् सत्य के स्वरूप में समाहित होने को उन्मुख हो जाता है । प्रकृतीय मोंह मात्र भ्रम है । अपरिवर्तनीय की गरिमा सत्य है । इस सत्य का अनुभव होना ही ज्ञान है ।

रविवार, 13 जुलाई 2014

उद्देष्य

किसी भी व्यक्तित्व के उत्कर्ष में उद्देष्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान होता है । व्यक्ति क्या उद्देष्य धारण कर जीवन यापन कर रहा है । उस उद्देष्य को अपने समस्त कार्यकारी अंगों के आम अभ्यास के रूप में व्यवहृत कर रहा है । उस उद्देष्य की पूर्ति में उसने अपने कर्तापन के अहंकार को कितना निर्मूल कर लिया है । उसने सर्वभौम परम् सत्य के प्रयोजन को पूर्ण करना ही मानो अपना उद्देष्य निर्धारित कर लिया है । सर्वभौम सत्य ने इस संसार को चर्मोत्कर्ष ज्ञान तक पहुँचाने के लिये ही बनाया है । इसलिये जो भी मनुष्य उस सर्वभौम सत्य के प्रयोजन को ही अपना उद्देष्य निर्धारित करेगा उसके व्यक्तित्व का अतुलनीय विकास होगा । 

शनिवार, 12 जुलाई 2014

संतुलन

किसी भी मनुष्य के जीवन में दो मूल्यों (1) वह अ[पने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा का कितना सम्मानजनक उपयोग करता है (2) प्रकृतीय मोंह में कितना आसक्त है, के मध्य क्या संतुलन है, निर्धारित करता है उस व्यक्ति का जीवन स्तर । कोई भी मनुष्य पूर्णरूप से ना ही अपनी इच्छाओं का पूर्णनियंत्रण कर आत्मा के ईश्वरीय सम्मान को निर्विवाद रूप से स्थापित कर सका है और ना ही कोई इतना चर्मोत्कर्ष आसक्त ही है जो रंचमात्र भी ईश्वर के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता है । इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के जीवन का भेद इसी दो मूल्यों के तुलनात्मक संतुलन के द्वारा निर्धारित होता है । जो सचेष्ट हो अपने अंदर ईश्वरीय मर्यादा को पूर्णरूप से स्थापित करने को प्रयत्नशील होता है उसका जीवन अधिक शांत और आनंद को प्राप्त होता होता है । जो बिना विचारे आसक्ति में लिप्त रहता है वह अधिक अशांत और दु:ख की स्थितियों के मध्य जीवन बिताता है । 

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

आत्मा की गरिमा

आत्मा परम् सत्य का अंश है । यह मात्र परम् सत्य को व्यक्त करने वाला नहीं है अपितु उसका वास्तविक पुत्र समान हिस्सा है । इस सत्य को जो भी व्यक्ति अपने जीवन में सत्यरूप में अनुभव कर तद्नुसार उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप जीवन यापन कर सकता है वही सर्वोत्कृष्ट जीवन का भोग करता है । प्रकृतीय मोंह में बँधना आम जीवन का स्वरूप है । इस मोंह से बचना विषेस उपलब्धि है । विषेस उपलब्धि विषेस प्रयत्नों से ही मिलेगी । यह उस परम् सत्य का विज्ञान है कि उन्होने संसार को ऐसा बनाया है कि इसमें भटकना आम पद्धति है । परंतु इस प्रचलित विचलन से बचकर विषेस जीवन भी हममें से ही लोग पाते हैं । इसके लिये आत्मा की गरिमा को पहचानना । उस गरिमा के अनुरूप आचरण करना ही अपेक्षित प्रयत्न है । 

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

वास्तविक परिचय

मनुष्य के व्यक्तित्व का वास्तविक परिचय उसके अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया है । जो भी मनुष्य अपने वास्तविक अस्तित्व उस परम् सत्य की उपस्थिति को अपना परिचय बनायेगा उसका ही व्यक्तित्व सर्वोत्कृष्ट होगा । इस स्थिति को पाने में बाधा मात्र मोंह होता है । प्रकृतीय गुणों में मोंह । इंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना । यही आच्छादन समाप्त होते ही हमारे अंदर विद्यमान ब्रम्ह प्रगट हो जावेगा । उसके आलोक में हमारे समस्त कृत पावन हो जावेंगे । हमारे विचारों का दायरा सर्वहिताय हो जावेगा । हम स्वार्थ के संकीर्ण जेल से मुक्त हो समस्त जगत के कल्याण के लिये अपनी सेवायें अर्पित करने को उन्मुख हो जावेंगे । जिस विधाता ने हमें जन्म दिया है कंचिद उसका मंतव्य यही था । 

बुधवार, 9 जुलाई 2014

मनुष्य शरीर

परम् सत्य का अंश हमारे सम्पूर्ण अंत:करण में समाया हुआ है । यह किसी भी बाह्य अन्य द्वारा अभेद्य है । यह मृत्यु और जन्म के सीमा से परे है । यह हमारे सम्पूर्ण जीवन का साक्षी होता है । इसके अतिरिक्त शरीर का प्रत्येक घटक विकसित होने वाला व मृत्यु द्वारा विलीन होने वाला है । जब तक मनुष्य को अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की पहचान नहीं होती और वह अपने विनाशशील शरीर को ही अपनी पहचान जानता है वह अज्ञान के अंधकार में जीवन जीता है । जब भी मनुष्य अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य को अनुभव करता है उसके जीवन का सम्पूर्ण रूप ही बदल जाता है । वह परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप कर्म करने लगता है । परम् सत्य की मर्यादा के अनुरूप जीवनजीने लगता है । वह परम् सत्य का जीवित प्रारूप ही बन जाता है । उसके जीवन में उसके विनाशशील शरीर का ढाँचा मात्र रह जाता है । उसका वास्तविक जीवन परम् सत्य का ही प्रगट रूप हो आता है। 

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

उत्तरोत्तर प्रगति

परम् सत्य अपने स्वरूप में अनंत, एकाकी, किसी दूसरे स्वरूप में विलय ना होने वाला और अपने में ही आनंदित रहंने वाला है । प्रकृतीय रचनाओं में परस्पर विरोधी स्वरूप और गुण प्रगट हुये हैं जो कि परम् सत्य को छिपा देने में समर्थ होते हैं । वर्तमान सृष्टि की समस्त रचनाओं में पाँच स्तर पाये जाते हैं । अन्न, प्राण, मनस, विज्ञान और आनंद । यह उत्तरोत्तर विकास है । मनुष्य चौथे स्तर विज्ञान श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है । इसे अभी आनंद की श्रेणी पाना शेस है । यह उपलब्धि सत्य का ज्ञान होने, सत्य के विधान के अनुरूप जीवन जीने से सम्भव होगी । यह स्थिति प्राप्त होने पर वह इस संसार की चर्मोत्कर्ष स्थिति को भोग करेगा । 

सोमवार, 7 जुलाई 2014

परम् सत्य और मोंह

परम् सत्य पूर्णतया पारलौकिक स्वत: अस्तित्व है । गुणयुक्त प्रकृति बंधनकारी है । मनुष्य जो कि प्रकृतीय रचना है परम् सत्य के अंश आत्मा से युक्त है । आत्मा प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होती है । इसलिये अज्ञानवश प्रकृतीय गुणों में मोंह जनित कर लेती है । सत्य स्थिति का ज्ञान ना होना अज्ञान है । सत्य स्थिति के अनुसार आत्मा समस्त कर्मों का प्रेरक है जबकि समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । इस सत्य को जानना । इस सत्य की मर्यादा में जीवन जीना । ज्ञान के प्रकाश में जीवन जीना है । इस सत्य के विपरीत अपने में कर्तापन का अहंकार करना । अपने को कर्ता मानते हुये अपनी इच्छा के कर्मों को करना । अज्ञान के अंधकार में जीवन जीना है । अज्ञान प्रवृत्त करता है बंधन । ज्ञान प्रवृत्त करता है मुक्ति । 

रविवार, 6 जुलाई 2014

आनंद

मनुष्य के प्रगति की सीमा परिभाषित की जाती है आनंद द्वारा । मनुष्य विज्ञान से उन्नति कर आनंद को पाता है । यह स्थिति मोंह से मुक्त होने के उपरांत ही प्राप्त हो सकती है । मुक्त आत्मा ब्रम्ह नहीं होती परंतु ब्रम्ह की अनुभूति से आनंद की स्थिति में होती है । आत्मा इस पंचतत्व की शरीर से भिन्न अस्तित्व है । इसकी अनुभूति प्रेरित करती है मुक्ति । मुक्त मिलने पर मिलता है आनंद । यही सर्वोच्च शिखर होता है प्रगति का । इसे पाना ही चर्मोत्कर्ष उपलब्धि है । 

शनिवार, 5 जुलाई 2014

साकार ब्रम्ह प्रकृति

परम् सत्य निर्गुण, निर्विकार, निर्लिप्त, चिर, दिव्य शांत स्वत: अस्तित्व है । प्रकृति उसकी रचना है । प्रकृति के रूप में परम् सत्य ने अपने को प्रगट किया है । सामान्य मनुष्य के लिये प्रकृति ही परम् सत्य का प्रगट ब्रम्ह स्वरूप है । इसी प्रकार मुक्त आत्मा आनंद से ओतप्रोत शांत भाव से कार्य में संलग्न होती है । उसे अलग अस्तित्व की कोई कामना नहीं होती है परंतु फिर भी वह एक अलग स्वरूप में परम् सत्य का प्रतिनिधित्व करती है । उसका अपना कोई प्रयोजन नहीं होता है फिर भी वह कार्य करती है । परम् सत्य की हमारे अपने अंदर उपस्थिति को किसी ज्ञानेंद्रिय के माध्यम से नहीं जाना जा सकता है परंतु अनुभव किया जा सकता है । 

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मुक्त जीवन

मुक्त आत्मा के धारक का जीवन मस्तिष्क और शरीर उस परम् सत्य की अनुभूति द्वारा मोंह के आच्छादन से पूर्ण मुक्त एक ज्योति के समान सत्य से प्रकाशित आभा के रूप में प्रगट होता है । उसका व्यक्तित्व का चर्मोत्कर्ष उत्कर्ष जिसमें हर्ष की मुद्रा स्वतंत्र अभिव्यक्ति किसी भी कलुषता के कलंक से रहित उत्कृष्टतम स्वरूप उदय होता है । वह मानों अपनी उपलब्धि को समस्त मानव समाज में वितरित कर देना चाहता है । उसका जीवन एक प्रतीक स्वरूप हो जाता है जिसे देख हर मोंह में आसक्त व्यक्ति प्रेरणा ग्रहण करे कि मुक्त जीवन ही आदर्श जीवन रूप है जिसे पाने के लिये हर सम्भव प्रयत्न किया जाय । 

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

परम् सत्य की शक्ति

मुक्त आत्मा परम् सत्य की शक्ति द्वारा परम् सत्य के प्रयोजन के कार्यों को करता है । वह परम् सत्य की अनुभूति में सदैव हर्षित रहता है । वह परम् सत्य की शक्ति और उर्जा से ओतप्रोत हर्षित मन सेवा में तत्पर रहता है । उसके व्यक्तित्व में द्वैत में विभाजित निष्ठा पूर्णरूप से लुप्त हो जाती है । वह चेतन, अर्धचेतन, तथा अचेतन की प्रत्येक अवस्थाओं में परम् सत्य की अनुभूति को ही प्रगट करता है । वह परम् सत्य की अनुभूति व उर्जा द्वारा सदैव हर्ष उल्लास की दशा में परम् सत्य के ज्ञान से प्रकाशित होता है । उसका जीवन मानो परम् सत्य का ही प्रगट स्वरूप बन जाता है । 

बुधवार, 2 जुलाई 2014

दु:ख

मस्तिष्क में इच्छाये छायी हुई हैं । इच्छाये पूरी नहीं हो रहीं है । वह दु:ख से बोझिल है । उसकी शरीर में कोई व्याधि नहीं, पीडा नहीं, परंतु फिर भी अशांत और दु:खी है । सारे दु:खों का श्रोत उसकी इच्छाये हैं । इन्ही इच्छाओं की उपस्थिति हमें अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की अनुभूति नहीं होने देती । हमारी इच्छायें ही हमारी सबसे विकट शत्रु हैं । फिर भी हम सभी को इच्छायें ही सबसे अधिक प्रिय हैं । लगता है कि इच्छायें ही सबसे बडी निधि हैं । यही मोंह हमें ईश्वर की अनुभूति से दूर किये रहता है । अनेकानेक दु:खो को हमारे ऊपर थोपे रहता है । 

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

सधर्म्य

मोंह से मुक्त आत्मा परम् सत्य के स्वरूप में विलीन होकर पूर्ण ईश्वरीय भोग में यापन करती है । ईश्वर स्वरूप में मनुष्य जीवन । ईश्वर की प्रेरणा से ईश्वर के कार्यों को करती है । आत्मा का ईश्वर में विलय हो जाता है । वह ईश्वर का रूप धारण कर लेती है । ईश्वर में एकीकृत स्वरूप । जितात्मन:, युक्तचेतसा, ऐसी आत्मा जो ईश्वर की अनुभूति से ईश्वरमय हो गई है । ईश्वर की अनुभूति में प्रतिपल विभोर । जिसका मस्तिष्क, विवेक, स्वभाव, कर्म सभी ईश्वर के एकीकरण में हो गया है । वास्तव में मोंह का आच्छादन ही इन तमाम स्थितियों को दूर किये रहता है । मोंह का नाश होते ही यह सभी स्थितियाँ प्रगट हो जाती हैं ।