गुरुवार, 29 मई 2014

अर्जुन का मोंह

अर्जुन ने महसूस किया कि युद्ध करके उसे अपने ही स्वजनों को मारना है जो कि राज्य की अभिलाषा के अधीन उसके सामने उसके शत्रु के रूप में उपस्थित हुये हैं । उसका मोंह उसके मस्तिष्क में व्याप्त मानसिक उद्वेगों से पैदा हुआ विचार था । उसे ऐसा लगा कि इन स्वजनो की हत्या कर यदि हम राज्य पाते भी हैं तो राज्य का सुख इन स्वजनों की हत्या से कलंकित होगा । वेदनाकारक होगा । ऐसी अनुभूति कंचिद हर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी ना किसी रूप में उपस्थित होती है । मनुष्य अपने ही मस्तिष्क में व्याप्त मोंह के अधीन जीवन जीते उसी मोंह को अपना जानने लगता है । यही अज्ञान का जीवन उसकी आसक्ति बन जाती है । जब इसे त्यागने की बात आती है तो उसे लगता है कि जैसे कुछ बहुत ही प्रिय को त्यागना है । परंतु यदि मोंह को नहीं त्यागेगे तो और अधिक मोंह में फसते जायेगे । अपने कर्तव्य दायित्व का निर्वाह नहीं कर सकेंगे । यदि इस स्थिति से उबरना है तो सत्य को जानना होगा । सत्य को अपनाना होगा । यदि ऐसा करेगे तो आनंद की स्थिति तक पहुँचेगे । मस्तिष्क में व्याप्त मोंह ही हम सभी के जीवन का रूप बना हुआ है । यही हमें अपने कर्तव्य से च्युत करता है । इसे पहचानना होगा । इसे त्यागना होगा । सत्यनिष्ठ व्यक्तित्व विकसित कर शांत दिव्य आनंद का भोग मिलेगा । 

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