परम् सत्य की रचना प्रकृति उन्ही
के पूर्ण नियंत्रण में इस सृष्टि का समस्त कार्यों को करने की कर्ता है । समस्त
प्राणी प्रकृति की रचना हैं । प्रकृति के कर्मों को करने के साधन मात्र हैं ।
प्रकृति द्वारा आरोपित एवं अपेक्षित कर्मों को करना ही हमारी मर्यादा है । मर्यादा
के अनुरूप कर्म करना ही हमारा धर्म है । मस्तिष्क में इच्छाओं का निवेश बाधित करता
है प्रकृति की आज्ञा को जानने से । यदि प्रकृति की अपेक्षाओं को यथास्वरूप जानना
है तो हमें अपनी इच्छाओं को पूर्ण नियंत्रित करना होगा । अन्यथा अपनी इच्छायें ही
प्रकृति के आदेश का भ्रामक स्वरूप प्रगट करती रहेगी । हम अपने धर्म के विपरीत
कार्यों में संलग्न होते ही रहेंगे ।
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