शुक्रवार, 6 जून 2014

सत्य स्वरूप

ज्ञान का जो स्वरूप विगत अनेको अंकों में लिखा जाता रहा है । उसकी एक अलग छवि । इस सृष्टि में जो भी कर्म किये जा रहे हैं उनकी कर्ता प्रकृति है । सृष्टि का समस्त विस्तार प्रकृति है । प्रकृति परम् सत्य की रचना है उत्पत्ति है । समस्त कर्मों के प्रेरक परम् सत्य स्वयं हैं । आत्मा परम् सत्य का अंश है । इस सृष्टि में नित्यकर्ता है । यह तथ्य आत्मसात् होना ही ज्ञान है । ज्ञान होना ही शांति की उपलब्धि है । आनंद है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें