ज्ञान का जो स्वरूप विगत अनेको
अंकों में लिखा जाता रहा है । उसकी एक अलग छवि । इस सृष्टि में जो भी कर्म किये जा
रहे हैं उनकी कर्ता प्रकृति है । सृष्टि का समस्त विस्तार प्रकृति है । प्रकृति
परम् सत्य की रचना है उत्पत्ति है । समस्त कर्मों के प्रेरक परम् सत्य स्वयं हैं ।
आत्मा परम् सत्य का अंश है । इस सृष्टि में नित्यकर्ता है । यह तथ्य आत्मसात् होना
ही ज्ञान है । ज्ञान होना ही शांति की उपलब्धि है । आनंद है ।
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