भक्ति द्वारा प्रभु की कृपा पाने
के लिये कुछ यत्न तो अवश्य ही करना होता है । प्रपत्ति में प्रभु की कृपा प्रभु के
द्वारा स्वत: प्रदान की जाती है । यह प्रश्न अनादिकाल से विचारणीय रहा है कि प्रभु
की कृपा क्या अपने प्रयत्नों से मिलती है अथवा प्रभु स्वयं कृपालु होकर कृपा सुलभ
करा देते हैं । केवल हिंदू धर्म में ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों में भी यह विचार का
विषय रहा है । अधिकतर विद्वान महात्माओं का यही मानना रहा है कि प्रभु स्वयं
कृपालु होकर अपनी कृपा मोहैय्या करा देते हैं । जिन भाग्यशाली लोगों को प्रभु की
कृपा का सुअवसर मिल जाता है वह ही प्रभु के दिव्यरूप का दर्शन भी पाते हैं और उनके
अमृतमय जीवन का सुखभोग भी पाते है । इन विद्वान महात्माओं की मान्यता का आधार इस
सत्य में निहित है कि पाप प्रत्येक प्राणी द्वारा होता है । पाप का स्वरूप ऐसा है
कि कोई प्राणी इससे बच नहीं सकता है । इसके बावज़ूद भी कुछ लोगो की उपलब्धि प्रभु
के कृपा की होती है । निश्चय ही यह प्रभु की कृपा द्वारा ही सम्भव होती है । यह
प्रभु का न्याय है कि वह किसे अपनी कृपा के लिये चुनते हैं ।
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