मस्तिष्क की स्वतंत्र वृत्ति को
विजय करना योगा है । इच्छाओं के लोक में भ्रमण करते मस्तिष्क को परम् सत्य के विधान
के अनुरूप कार्य करने के लिये नियंत्रित करना योगा द्वारा सम्भव होता है । कार्य करते
हुये कार्य के परिणाम से मोंह ना होना । यह योगा की मूल वाँक्षना है । सन्यास ।
कार्य के परिणाम से सन्यास । कार्य किया जाय । फल की लिप्सा ना रहे । इस अभ्यास से
मस्तिष्क के उद्वेग शांत होते है । शांत मस्तिष्क प्रकृति के कर्ता स्वरूप को
ग्रहण करता है । ज्ञान प्रगट हो जाता है । अज्ञेय ज्ञेय हो जाता है ।
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