जो संत अपनी इच्छाओं को पूर्णरूप
से नियंत्रित कर चुका है । जो कर्म को यंत्रवत् करता है । जो कि परम् सत्य का
प्रतिनिधि बन गया है । उसके लिये प्रकृति की अपेक्षा ही उसका कर्तब्य स्वरूप हो
जाता है । उसके लिये कर्म के फल का कंचिद कोई महत्व रह ही नहीं जाता ।
आम जीवन का अभ्यास इच्छाजनित
कर्मों को करने का है । इसलिये उपरोक्त वृतांत सहसा विश्वसनीय नहीं प्रतीत होगा ।
परंतु उपरोक्त वृतांत इतना सत्य है जितना की सूर्य का प्रकाश । यह बात सिद्धांतरूप
में समझकर जीवन में इसका सत्य अनुभव स्वयँ करें तो अधिक सार्थक परिणाम प्रगट होगा
। प्रकृति की अपेक्षा ही हमारा कर्तब्य है । यह इच्छाओं के विद्यमान रहते प्रगट
नहीं होता है । इच्छाओं के शून्य होने पर इसका स्वच्छ स्वरूप विदित होगा ।
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