आत्मचेतना की वह सीमा जहाँ शरीर की
प्रकृति पूर्णरूप से आत्मा के बोध से संतृप्त हो जाय । शरीर की प्रकृति आत्मा के भाव
से ओतप्रोत हो जाय । आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो स्वतंत्र है । मोंहजनित
आवश्यकतायें आत्मा की स्वतंत्रता से पूर्णरूप से पराजित हो चुकी होंवे । यह आत्मा
की प्रकृति पर विजय है । आत्मा प्रकृतीय मोंह में बँधकर प्रकृति का दास बन जाता है
। आत्मा की मोंह पर विजय उसकी स्वतंत्रता है । यह स्वतंत्रता इतनी बढ जाय कि मानों
प्रकृति को आगे आत्मा को अपने मोंह में बाधने की मंशा ही नहीं रह जाय । सम्पूर्ण
प्रकृति ही आत्ममय हो जाय ।
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