मस्तिष्क में इच्छाये छायी हुई हैं
। इच्छाये पूरी नहीं हो रहीं है । वह दु:ख से बोझिल है । उसकी शरीर में कोई व्याधि
नहीं, पीडा नहीं, परंतु फिर भी अशांत और दु:खी है । सारे दु:खों का
श्रोत उसकी इच्छाये हैं । इन्ही इच्छाओं की उपस्थिति हमें अपने अंदर विद्यमान परम्
सत्य की अनुभूति नहीं होने देती । हमारी इच्छायें ही हमारी सबसे विकट शत्रु हैं ।
फिर भी हम सभी को इच्छायें ही सबसे अधिक प्रिय हैं । लगता है कि इच्छायें ही सबसे
बडी निधि हैं । यही मोंह हमें ईश्वर की अनुभूति से दूर किये रहता है । अनेकानेक दु:खो
को हमारे ऊपर थोपे रहता है ।
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