अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की
छाया की अनुभूति कर्म के माध्यम से करने के लिये अपने को उस परम् सत्य के यंत्र के
रूप में प्रस्तुत करना होगा । अपने स्वभाव व बाह्य कर्म में एकरूपता पैदा करनी
होगी । परम् सत्य बिलकुल अलौकिक अस्तित्व है । उसके अलौकिक गरिमा के अनुरूप हमें
भी प्रकृतीय मोंह से अपने को मुक्त करना होगा । परम् सत्य की अपेक्षा के अनुरूप
हमें उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप आचरण बनाना होगा । प्रतिपल यह स्मरण रखना
होगा कि हमारे अंदर जो हमारी पहचान है वह वही परम् सत्य है । उसकी अपेक्षानुसार
कर्म करने से कर्म बंधनकारी नहीं रह जावेंगे ।
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