सोमवार, 16 जून 2014

आत्मचेतना

अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया की अनुभूति कर्म के माध्यम से करने के लिये अपने को उस परम् सत्य के यंत्र के रूप में प्रस्तुत करना होगा । अपने स्वभाव व बाह्य कर्म में एकरूपता पैदा करनी होगी । परम् सत्य बिलकुल अलौकिक अस्तित्व है । उसके अलौकिक गरिमा के अनुरूप हमें भी प्रकृतीय मोंह से अपने को मुक्त करना होगा । परम् सत्य की अपेक्षा के अनुरूप हमें उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप आचरण बनाना होगा । प्रतिपल यह स्मरण रखना होगा कि हमारे अंदर जो हमारी पहचान है वह वही परम् सत्य है । उसकी अपेक्षानुसार कर्म करने से कर्म बंधनकारी नहीं रह जावेंगे । 

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