आत्मा प्रकृति के मध्य रहकर, प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होते हुये सहज़ रूप से प्रकृतीय गुणों और इंद्रीय
वासनाओं की आसक्ति जनित कर लेती है । इसी व्यापक आसक्ति को एक शब्द में व्यक्त
करने के लिये मोंह शब्द का प्रयोग किया जाता है । यह जटिल व्याधि है । रोगग्रस्त
को दुसह अशांति और कलह प्रदान करने वाली होती है । इस व्याधि के विद्यमान रहते
मनुष्य और अधिक मोंह में बँधता चला जाता है । इसके कुप्रभाव से बचने का मात्र एक
उपाय होता है विद्यमान मोंह को निर्मूल करना । इस उपलब्धि के लिये कोई बाहरी औषधि
अथवा विधा सहायक नहीं हो सकती । आत्मचेतना को जाग्रित करना ही एकल पथ है । दृढ
प्रयत्न द्वारा मोंह नाश होता है । प्रतिफल स्वरूप आनंद प्राप्त होता है ।
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