शनिवार, 2 अगस्त 2014

रस्सा कशी

परम् सत्य ने मनुष्य को ऐसा बनाया है कि इसका जीवन प्रकृति और आत्मा के मध्य परस्पर व्यवहृत करने की एक रस्सा कशी के सदृष्य है । प्रकृति आत्मा को अपने गुणों में मोंहित करने में सदैव सफल होती है । प्रकृतीय गुणों में मोहित आत्मा इंद्रीय भोगो के लिये लालायित रहती है । इस प्रक्रिया से गुज़रती आत्मा सर्वथा अपने स्वरूप और ईश्वरीय मर्यादा को पूर्णतया विस्मृत कर अहंकार के वशीभूत इच्छाजनित कार्यों को करने में संलग्न रहती है । यह स्थिति मनुष्य को दु:ख और संताप के हिलोरों के मध्य उठाता पटकता रखती है । इसके विपरीत यदि सत्संग के प्रसाद से   कंचिद कोई आत्मीय बोध और ईश्वरीय मर्यादा के जीवन पाने को प्रयत्नशील होता है तो उसे एक संघर्ष की स्थिति का सामना करना होता है । प्रकृतीय मोंह का नाश विषेस प्रयत्नों से ही सम्भव है । 

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