अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की
छाया का अनुभव । उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप जीवन । परम् सत्य ही समस्त
कर्मों का प्रेरक है । इस सत्य को स्वीकार करके अपने को परम् सत्य के प्रयोजन के
लिये एक यंत्र के रूप में उसे अर्पित करना । यही आदर्श अपेक्षित स्वरूप है । हम
परम् सत्य के प्रयोजन के लिये एक समर्पित यंत्र हैं । यह जीवन का स्वरूप जो भी कोई
बना सकेगा उसे अनुभव हो सकेगा परम् सत्य के चिर शांति का प्रसाद । उसके कर्म
बंधनकारी नहीं होंगे ।
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