शनिवार, 31 मई 2014

चिर सन्यासी

जो मनुष्य कार्य के परिणाम की अपेक्षा किये बिना काम करने का अभ्यास सृजित करता है और कार्य को कर्ता प्रकृति को समर्पित कर कार्य का अभ्यास अपना आम अभ्यास बनाता है वह चिर सन्यासी होता है । वह प्रत्येक स्थिति को वह जिसभी रूप में प्रगट होती हैं ग्रहण करता है । वह किसी भी स्थिति को बिना किसी पश्च्याताप के छोड आगे प्रवृत्त होता है । उसे ना ही किसी प्रगट होने वाली स्थिति से कोई अपेक्षा होती है और ना ही किसी विगत स्थिति से कोई ग्लानि ही होती है । 

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