शनिवार, 31 मई 2014

चिर सन्यासी

जो मनुष्य कार्य के परिणाम की अपेक्षा किये बिना काम करने का अभ्यास सृजित करता है और कार्य को कर्ता प्रकृति को समर्पित कर कार्य का अभ्यास अपना आम अभ्यास बनाता है वह चिर सन्यासी होता है । वह प्रत्येक स्थिति को वह जिसभी रूप में प्रगट होती हैं ग्रहण करता है । वह किसी भी स्थिति को बिना किसी पश्च्याताप के छोड आगे प्रवृत्त होता है । उसे ना ही किसी प्रगट होने वाली स्थिति से कोई अपेक्षा होती है और ना ही किसी विगत स्थिति से कोई ग्लानि ही होती है । 

शुक्रवार, 30 मई 2014

कर्म द्वारा पूर्णता

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोहाशक्त अर्जुन को बताया कि कर्म करते हुये भी मनुष्य जीवन की पूर्णता की आदर्श स्थिति पायी जा सकती है । इस उपलब्धि के लिये उसे प्रकृति द्वारा आदेशित कार्यों को करते हुये अपनी मानसिक स्थिति को इसप्रकार नियंत्रित रखना होगा कि कार्य के परिणाम के प्रति कोई आसक्ति ना रहे ।

प्रकृति के गुणों में मोहाशक्ति के आच्छादन की उपस्थिति ही पूर्णता की स्थिति का बाधक होती है । इस व्याधि का निवारण कर्म द्वारा यदि लक्षित किया जाय तो सम्भवतया यह सबसे सरल निदान होगा । कार्य जिसे मनुष्य प्रतिपल करता है । इसलिये उसे सुधार का अवसर प्रतिपल मिलेगा । इसप्रकार यह सभी अन्य उपायों की अपेक्षा अधिक प्रभावी परिणामपोषक होगी ।  

गुरुवार, 29 मई 2014

अर्जुन का मोंह

अर्जुन ने महसूस किया कि युद्ध करके उसे अपने ही स्वजनों को मारना है जो कि राज्य की अभिलाषा के अधीन उसके सामने उसके शत्रु के रूप में उपस्थित हुये हैं । उसका मोंह उसके मस्तिष्क में व्याप्त मानसिक उद्वेगों से पैदा हुआ विचार था । उसे ऐसा लगा कि इन स्वजनो की हत्या कर यदि हम राज्य पाते भी हैं तो राज्य का सुख इन स्वजनों की हत्या से कलंकित होगा । वेदनाकारक होगा । ऐसी अनुभूति कंचिद हर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी ना किसी रूप में उपस्थित होती है । मनुष्य अपने ही मस्तिष्क में व्याप्त मोंह के अधीन जीवन जीते उसी मोंह को अपना जानने लगता है । यही अज्ञान का जीवन उसकी आसक्ति बन जाती है । जब इसे त्यागने की बात आती है तो उसे लगता है कि जैसे कुछ बहुत ही प्रिय को त्यागना है । परंतु यदि मोंह को नहीं त्यागेगे तो और अधिक मोंह में फसते जायेगे । अपने कर्तव्य दायित्व का निर्वाह नहीं कर सकेंगे । यदि इस स्थिति से उबरना है तो सत्य को जानना होगा । सत्य को अपनाना होगा । यदि ऐसा करेगे तो आनंद की स्थिति तक पहुँचेगे । मस्तिष्क में व्याप्त मोंह ही हम सभी के जीवन का रूप बना हुआ है । यही हमें अपने कर्तव्य से च्युत करता है । इसे पहचानना होगा । इसे त्यागना होगा । सत्यनिष्ठ व्यक्तित्व विकसित कर शांत दिव्य आनंद का भोग मिलेगा । 

बुधवार, 28 मई 2014

श्रीमद् भागवद गीता

कुरू वंश में दो भाई थे पाण्डु और धृतराष्ट्र । धृतराष्ट्र जन्म से अंधा था । इसके सौ पुत्र थे कौरव । इन सौ पुत्रो का विकास लालच, ईर्ष्या, घृणा, अहंकार के विचारो से प्रेरित हुआ था । पाण्डु के पाँच पुत्र थे । इनका विकास सद् विचारों के महौल में हुआ था । पाण्डु राजा थे । उनकी मृत्यु हो गई । धृतराष्ट्र ने राज्य का उत्तराधिकारी होने का दावा किया । इनको दुष्ट रिश्तेदारों का समर्थन भी प्राप्त था । कृष्ण ने मध्यस्थता की और प्रयत्न किया कि बातों के द्वारा समस्या का समाधान निकल सके । परंतु ऐसा सम्भव नहीं हुआ । युद्ध द्वारा उत्तराधिकार निर्धारित होने का फैसला हुआ । महाभारत का युद्ध । इस युद्ध को लडने के लिये दोनों पक्ष की सेनायें एकत्रित हुई । पाण्डु के पुत्रों में धनुर्धारी महायोद्धा अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में विशाद हुआ और वह युद्ध लडने से विमुख हुये । श्रीकृष्ण ने उन्हे उनके मस्तिष्क में उत्पन्न हुये मोंह को बताया और उन्हे सत्य ज्ञान को बताया । श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परामर्श दिया कि वह मस्तिष्क में व्याप्त मोंह का नाश ज्ञान की तलवार से करे और अपने कर्तव्य रूपी युद्ध को लडे । अर्जुन ने कृष्ण के परामर्श को समझा और स्वीकारा और अपने मस्तिष्क में आच्छादित मोंह पर विजय कर पुन: अपने दायित्व को पूर्ण निर्वाह करने के रूप में युद्ध लडने के लिये तत्पर हुये । यही मस्तिष्क को आच्छादित करने वाले मोंह और सत्य स्थिति का ज्ञान श्रीमद् भागवद गीता का धर्म दर्शन है । इस मोंह का नाश कैसे किया जाय और सत्य ज्ञान द्वारा कैसे कर्तव्य निर्वाह किया जाय यह पथ प्रशस्थ करता है श्रीमद् भागवद गीता का धर्मदर्शन । 

मंगलवार, 27 मई 2014

मोंह शत्रु है

मनुष्य अपने कर्तव्य दायित्व से मोंह के अधीन च्युत होता है । मोंह इंद्रीय वासनाँओं के अधीन भी होता है और सत्य का ज्ञान ना होने से भी होता है । अपने कर्तव्य दायित्व से बिमुख होना मनुष्य के अस्तित्व को ही प्रश्नवाचक बनाने के तुल्य होता है । मोंह का नाश सत्य के ज्ञान द्वारा तथा अपनी वासनाओं के नियंत्रण द्वारा सम्भव होता है । यदि हमारे अंदर घृणा का जन्म होता है तो यह हमारी आत्मिक पराजय है । कर्तव्य का स्वरूप शाश्वत होता है । मस्तिष्क की सही दशा हमें मोंह से उबरने का पथ प्रदान करती है । 

सोमवार, 26 मई 2014

संयमित मस्तिष्क

कर्मों को करते हुये कर्मों के बंधन से मुक्त हुआ जा सकता है । इसके लिये अपने दायित्व के कर्मों को करते समय पूर्ण समर्पण के साथ पूर्ण निष्ठा से बिना कर्म फल के साथ कोई मानसिक संकल्प धारणकिये हुये कर्म किया जाय । कर्म प्रकृति द्वारा अपेक्षित और आदेशित होना चाहिये । उपरोक्त समस्त उपलब्धि मस्तिष्क के संयमित आचरण से ही सम्भव हो सकती हैं । 

रविवार, 25 मई 2014

मस्तिष्क

यह अत्यंत वैज्ञानिक यंत्र है । यह समस्त कर्मों का नियंत्रक होता है । इसलिये इसकी यथास्थिति कर्म की गुणवत्ता का निर्धारण करने वाली होती है । मोंह से ग्रसित मस्तिष्क त्रुटिपूर्ण कर्मों को प्रेरित करने को उद्यत होता है । इच्छाओं के पूर्ति के भ्रम में किये जाने वाले कर्म मस्तिष्क के मोंह की वृद्धि करने वाले होते हैं । जीवन में शांति होगी अथवा कलह होगी यह पूर्णतया मस्तिष्क की दशा का फल होगा । इच्छाओं के तूफान यदि मस्तिष्क में चलते रहेंगे तो दु:ख और कलह ही उपलब्धि होगी । इसके विपरीत मस्तिष्क की शांत दशा उत्कर्ष की ओर अग्रसर होना है । कर्म द्वारा चरित्र निर्माण के विचार में शांत मस्तिषक सर्वाधिक महत्व का होता है ।   

शनिवार, 24 मई 2014

कुरु क्षेत्र

जिस कुरू क्षेत्र का श्रीमद् भागवद् गीता में वृतांत है वह हम प्रत्येक का अपना मस्तिष्क ही है । इसमें सद् विचार स्वरूप पाण्डव व दुर्विचार स्वरूप कौरव बसते हैं । उत्तराधिकार का प्रश्न सामाजिक रूप से प्रचलित वंश की मर्यादानुसार प्रतिस्थापन की विधा से भिन्न व्यक्ति अपने अंदर विद्यमान सद् विचार अथवा दुर्विचार किसे प्रफुल्लित होने हेतु कर्म करता है उस पर आधारित उसका व्यक्तित्व विकसित होगा । आवश्यक नहीं कि जिसके पूर्व के कर्म भ्रम पर आधारित थे तो वह ज्ञान पाने के लिये उद्यत नहीं हो सकता है । यह हर प्रत्येक मनुष्य के अपने मस्तिष्क के अंदर का साम्राज्य उसकी अपनी धरोहर होती है । इसमें परम् सत्य की मर्यादा को जान उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप कर्म करने को उद्यत होने पर जीवन विकसित व्यक्तित्व की ओर उन्मुख होता है । इस संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से आदर्श के अनुरूप नहीं होता है । परंतु सही पथ से कर्म कर जीवन को उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये । 

शुक्रवार, 23 मई 2014

भ्रम

पहले तो इच्छा पैदा होती है । इस इच्छा की पूर्ति के उद्देष्य से किये जाने वाले कर्म में एक निष्चित फल की कामना मस्तिष्क में बसी रहती है । यही भ्रम का स्वरूप होता है । इस भ्रम के वशीभूत जो भी कर्म किया जावेगा वह बंधनकारी होगा । किसी भी कर्म को करने में किसी फल विषेस की कामना रखना यह भ्रम है । इस भ्रम के ग्रसित कार्य चाहे प्रगटरूप से स्वार्थ की पूर्ति के लिये ना होकर परमार्थ को ही लक्षित क्यों ना होवे वह बंधनकारी होगा । उस कर्म के परिणाम के आधार पर कर्ता व्यक्ति अगले कर्म को करने को बाध्य होगा । 

गुरुवार, 22 मई 2014

सन्यास

कर्म के प्रभाव द्वारा उत्पन्न होने वाला कर्मफल । कर्मफल के प्रभाव से किये जाने वाला नया कर्म । कर्म श्रँखला में बँधना बंधन है । इस बंधन से मुक्ति का विचार । विश्लेषणात्मक अध्ययन यह प्रगट करता है कि बंधन मात्र कर्म करने से नहीं पैदा होता है । बंधन की जड होती है कर्म करने के निमित्त में । कर्म करने का निमित्त यदि इच्छाओं की पूर्ति के आधार पर है तो निश्चय ही उस कर्म के फल के आधार पर वह कर्ता व्यक्ति नये कर्म करेगा । प्रकृति सतत कार्य करती है । इसलिये यदि कोई कार्य से सन्यास का लक्ष्य करेगा तो वह प्रकृति के कोप का भोगी बनेगा । इसलिये योग्य विचार यह है कि कार्य किये जाँय परंतु कार्य को करने की प्रेरणा ग्रहण करने में विचारशील रहा जाय । यही धर्मदर्शन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोहाशक्त अर्जुन को बताया  

बुधवार, 21 मई 2014

मुक्ति और बंधन

हर प्रत्येक मनुष्य जो भी कर्म करता है उसका कोई फल होता है । इन्ही कर्मों के फल द्वारा दूसरे अन्य कर्म वह करता है । इस प्रकार फलों के प्रभाव से वह नये कर्म करने के लिये बँधता जाता है । इस बंधन से मुक्त होने का विचार आने पर प्रथम सरलतम् उपाय प्रतीत होता है सन्यास । सभी कर्मों को करने से अपने को वँचित रखना । परंतु सन्यास इस संसार की रचना के उद्देष्य के विपरीत है । इस संसार की उत्पत्ति कर्म करने के लिये हुई है । इस संसार की समस्त गति कर्म द्वारा है । इसलिये सन्यास ग्राह्य विचार नहीं है । कर्म किया जाय परंतु किसी ऐसी विधि द्वारा किया जाय जिससे करने वाला कर्मफल के बंधन में ना पडे । सिद्धांतरूप में यह योग्य विकल्प प्रतीत होता है । हिंदू धर्मदर्शन इस मत की पुष्टि करता है । यही व्यवहारिक ग्राह्य मत है ।  

मंगलवार, 20 मई 2014

भक्ति का रूप

जब भक्त परम् सत्य पर पूर्णरूप से समर्पित हो जाता है । परम् सत्य ही उस भक्त के मस्तिष्क की प्रबलतम भाव जाग्रित प्रेम बन जाता है । ऐसे में फिर भक्त जो कुछ भी करता है अपने ईष्ट परम् सत्य की महिमा में ही करता है । भक्ति अपने को पूर्णरूप से परम् सत्य को अर्पित करने का ही रूप है । यह परम् सत्य पर विश्वास करने, उन्हे प्यार करने, उन्हे समर्पित होने, उसी परम् सत्य में समा जाने को ही भक्ति कहा जाता है । भक्ति अपनी भावनाओं का ही फल होती है । भक्त परम् सत्य की अनुभूति करते उनकी सेवा के लिये स्फूर्ति से भरा होता है । 

सोमवार, 19 मई 2014

प्रभु की सेवा

भक्त का एकमात्र लक्ष्य होता है प्रभु की सेवा । भक्त का एकमात्र साधन है प्रेम । भक्त प्रेयसी प्रेम की अभिव्यक्ति में चाहे प्रभु के चरण धोये अथवा उनकी आरती करे उसका एक ही भाव प्रगट होता है प्रभु की सेवा । प्रभु की सेवा ही मानो भक्त के जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाता है । प्रभु के आदेश का सेवाभाव से पालन ही भक्त के जीवन का एकमात्र उपलब्धि बन जाती है । भक्त के लिये प्रभु ही एकमात्र अवलम्ब हैं जिनके ऊपर समस्त संसार आश्रित है । भक्त ऐसे सक्षम प्रभु के साथ अपने को सम्बद्ध अनुभव करके उनके गुणगान करते उन्ही की स्मृति में विभोर हो नाचता है । प्रभु पर पूर्णरूप से समर्पित । 

रविवार, 18 मई 2014

प्रपत्ति ज्ञानरूप

मनुष्य के अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया का बोध ज्ञान है । भक्ति ज्ञान को पाने का मार्ग प्रशस्थ करती है । जब भक्ति प्रज्वलित होती है तो मनुष्य के अंदर विद्यमान आत्मा का उज्जवल प्रकाश भक्त को ज्ञान से प्रकाशित करता है । भक्त अपने अंदर परम् सत्य को विद्यमान अनुभव करता है और अपने को परम् सत्य के अंदर निवास करता हुआ अनुभव करता है । भक्त परम् सत्य के साथ सम्बद्ध अनुभव करता है । भक्त प्रहलाद कहते हैं कि मनुष्य के लिये उच्चतम आदर्श स्थिति है कि वह परम् सत्य को पूर्णरूप से निक्षावर हो जाय । इसी भावना को पोषित करते हुये प्रपत्ति ज्ञान का प्रगट रूप है । 

शनिवार, 17 मई 2014

प्रपत्ति के चरण

प्रपत्ति का पूर्ण स्वरूप विकसित होने में (1) अनुकूलस्य संकल्प: - सभी के प्रति सद्भाव (2) प्रतिकूलस्य वर्जनं दुर्भावना वर्जित (3) रक्षिस्याति विस्वास: - प्रभु रक्षा करेगा में अडिग विश्वास (4) गोपतृत्व वर्णं प्रभु की ओर रक्षा के विश्वास से घूमना (5) कार्पण्यम् असहाय का अहसास (6) आत्मनिक्षेप: - पूर्ण आत्मसमर्पण । इन छ: चरणों में अंतिम चरण ही लक्षित उपलब्धि होती है । शेस पाँच चरण मंजिल पाने की क्रमबद्ध स्थितियाँ हैं । 

शुक्रवार, 16 मई 2014

प्रभु की कृपा

भक्ति द्वारा प्रभु की कृपा पाने के लिये कुछ यत्न तो अवश्य ही करना होता है । प्रपत्ति में प्रभु की कृपा प्रभु के द्वारा स्वत: प्रदान की जाती है । यह प्रश्न अनादिकाल से विचारणीय रहा है कि प्रभु की कृपा क्या अपने प्रयत्नों से मिलती है अथवा प्रभु स्वयं कृपालु होकर कृपा सुलभ करा देते हैं । केवल हिंदू धर्म में ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों में भी यह विचार का विषय रहा है । अधिकतर विद्वान महात्माओं का यही मानना रहा है कि प्रभु स्वयं कृपालु होकर अपनी कृपा मोहैय्या करा देते हैं । जिन भाग्यशाली लोगों को प्रभु की कृपा का सुअवसर मिल जाता है वह ही प्रभु के दिव्यरूप का दर्शन भी पाते हैं और उनके अमृतमय जीवन का सुखभोग भी पाते है । इन विद्वान महात्माओं की मान्यता का आधार इस सत्य में निहित है कि पाप प्रत्येक प्राणी द्वारा होता है । पाप का स्वरूप ऐसा है कि कोई प्राणी इससे बच नहीं सकता है । इसके बावज़ूद भी कुछ लोगो की उपलब्धि प्रभु के कृपा की होती है । निश्चय ही यह प्रभु की कृपा द्वारा ही सम्भव होती है । यह प्रभु का न्याय है कि वह किसे अपनी कृपा के लिये चुनते हैं । 

गुरुवार, 15 मई 2014

प्रपत्ति

हम अपने प्रयत्नों द्वारा परम् सत्य आराध्य को नहीं पा सकते । जब यह विचार मस्तिष्क में समा जावेगा तो एक मात्र उपाय रह जावेगा समर्पण । बिना किसी शर्त समर्पण । यह भाउकता की पराकाष्ठा स्थिति है । यह स्थिति भक्ति की वाँक्षनाओं प्यार व विश्वास से भी आगे है । हमारी कुण्ठायें ही बाधा होती हैं । समर्पण की शाश्वततम स्थिति होती है प्रपत्ति । यह आराध्य के कृपा का सीधा विश्वास है । आराध्य के प्रति विश्वास का पवित्र स्वरूप है । यह समर्पण का चर्मोत्कर्ष स्वरूप है । जब हम अपने को पूरा खाली कर देंगे तो आराध्य हमारे ऊपर शासन करेगा । आराध्य द्वारा इस अधिग्रहण में हमारे अपने आचरण, घमण्ड, मानसिक संकल्प, हमरी इच्छायें, और हमारे पूर्वाग्रह बाधक होते हैं । इन सबका परित्याग हमें आराध्य द्वारा अधिग्रहीत करने के लिये योग्य पात्र बना देता है । हम अपने को आराध्य के हाथों समर्पित कर देते हैं कि वह जैसा चाहे हमारे साथ करे । 

बुधवार, 14 मई 2014

भक्ति का फल

समर्पण ही उपलब्धि है भक्ति की । जिस आराध्य को भक्त समर्पित हुआ उसी में वह विलीन हो गया । भक्त का कोई अलग अस्तित्व नहीं रह गया । जो भी शेष है वह आराध्य ही है । आराध्य तो परम् सत्य दिव्य स्वरूप शांति का समुंद्र है । यही सब कुछ वह भक्त भी हो गया । यहीं उपलब्धि ज्ञानी की भी होती है । यही उपलब्धि योगी की भी होती है । यही भक्त को भी मिला । इसीलिये भक्त को आराध्य को जानने की आवश्यकता नहीं थी । मात्र उसे आराध्य को सम्पूर्ण सत्य समर्पण की एकमात्र वाँक्षना बतायी गयी थी । समर्पण ऐसे स्तर का जिसमें उसका अपना कोई स्वरूप शेस ना बचे । अहंकार मोंह सभी छूट जायेगें । बिना इन व्याधियों के छूटे समर्पण होगा ही नहीं । आराध्य के प्रति श्रद्धा संजोये भक्त के समर्पण से पैदा होने वाला रूप है भक्ति । भक्ति उस सर्वशक्तिमान सक्षम आराध्य के प्रति समर्पण व विश्वास है जो कि कृपालु होकर इस संसार के समस्त भक्तों की विकृति आत्माओं को उनकी विकृति से मुक्त करके उद्धार के लिये स्वयँ आता है । 

मंगलवार, 13 मई 2014

ज्ञान की भक्ति

परम् सत्य को जानना ज्ञान है । भक्ति ज्ञान नहीं हैं । भक्ति ज्ञान पर आधारित है । ज्ञान प्राप्त महापुरुषों द्वारा भक्ति बतायी गयी है । इसे अपनाने से भक्त आत्मा को उसी आत्मीय शांति की अनुभूति मिलती है जो ज्ञान प्राप्त होने से मिलती है । भक्त के लिये गुण बताये गये आराध्य के प्रति विनम्र मानसिक चेतना, आराध्य के प्रति आज्ञाकारिता आराध्य की सेवा में प्रतिपल तत्पर, व्यापक आराध्य के सम्मुख तुच्छ भक्त के रूप प्रस्तुत, और कोमल प्यार संजोये आराध्य को पूर्णसमर्पण को तत्पर । इतने गुणों को संजोये भक्त आराध्य से जुडना जाहता है । ऐसा करने से उसे वही आत्मीय शांति मिलती है जिसे ज्ञानप्राप्त होने पर पाया जाना बताया जाता है । इस रूप में परम् सत्य ही एकमात्र पुरुष है अन्य सब स्त्री समान हैं जो उस एक पुरुष से जुडना चाहते हैं । 

सोमवार, 12 मई 2014

अद्वैत द्वैत

परम् सत्य प्रत्येक रूप अस्तित्व में विद्यमान है इस सत्य में ही धर्मदर्शन की मान्यता का आधार निहित होता है । यदि विलय का अर्थ इसप्रकार निकाला जाय कि जिसमें जीव की सत्ता को शून्य करार दिया जाय अथवा परम् सत्य के पारलौकिक अस्तित्व को प्रश्नवाचक बताया जाय तो भक्ति का कोई स्थान नहीं रह जावेगा । निर्माता प्रकृति और निर्मित प्रकृति के मध्य भेद ही आधार होता है भक्ति का । परम् सत्य का कोई दूसरा स्वरूप नहीं है । इसलिये सत्य तो अद्वैत ही है । द्वैत का अस्तित्व तो आराधना के लिये ही है । आराधक असत्य होते हुये भी अस्तित्वधारी है । आराध्य सत्य है । द्वैत का भाव आराधना के उद्देष्य से ही है । परम् सत्य करुणावश अपने आराधक को आश्वासन देता है कि पूर्णनिष्ठा से समर्पित आराधक की सम्पूर्ण हितरक्षा वह करेगा । आराध्य के संरक्षण से आश्वस्थ आराधक प्रेम और समर्पण से आराध्य की आराधना करता है । यह प्रेम और विश्वास का रिश्ता है । आराधना तो वैयक्तिक ईश्वर प्रकृति की ही की जाती है । जबकि परम् सत्य प्रकृति नहीं है । यह सत्य है कि भक्त आराधक मोंह से मुक्ति के लिये नहीं अपितु आराध्य की करुणा की कामना से आराधना करता है । ज्यादा से ज्यादा आराधक के मस्तिष्क में यह विश्वास रहता है कि आराध्य उसे मोंह से मुक्त करेगा । 

रविवार, 11 मई 2014

भक्ति

भक्ति भज शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है स्वामी की सेवा । यह ईश्वर के प्रति प्रेम का सम्बंध है । नारद मुनि इसकी परिभाषा करते हुये कहते हैं कि यह ईश्वर के प्रति प्रगाड प्यार है । साण्डिल्य मुनि के अनुसार ईश्वर के प्रति प्रगाड चाहत है । यह ईश्वर की प्रभुता में विश्वास के आधार पर समर्पण है । मुनि भोज के अनुसार ऐसा प्यार जिसमें इंद्रीय भोग की कामना किये बिना अपने समस्त प्रयत्नों को प्रभु को समर्पित करना है । यह इतने गहरे प्यार का अनुभव है जिसमें इच्छाओं का पूर्ण निषेध किया जाता है । सम्पूर्ण हृदय ईश्वर के प्यार से ओतप्रोत करना ही लक्ष्य होता है । वास्तविकता में भक्ति के पक्षकार संतजन आत्मा की मोंह से मुक्ति की कामना की अपेक्षा अपने ईष्ट की इच्छा के अनुरूप अपने को बनाने की संसतुति करते हैं । भक्त की आत्मा ईश्वर के महिमा के ध्यान द्वारा ईश्वर के परम् सत्य स्वरूप की अच्छाइयों का सतत स्मरण द्वारा ईश्वर का सतत भक्ति भाव से स्मरण द्वारा ईश्वर के गुणगान की चर्चा अन्य के साथ करने के द्वारा ईश्वर के गुणों का गायन अपने संग के मनुष्यों सामने करने के द्वारा और प्रत्येक कृत्य को ईश्वर की सेवा के रूप में करने के द्वारा अपने को ईश्वर के सन्निकट पहुँचती है । 

शनिवार, 10 मई 2014

समर्पण

अव्यक्त की उपासना कठिन लक्ष्य होता है । इसे प्रत्येक व्यक्ति साध्य नहीं कर सकता है । इसलिये अद्वैत की उपासना के स्थान पर व्यक्त रूप में वैयक्तिक ईश्वर प्रकृति के प्रति समर्पण का पथ सुझाया गया । आदिकालीन महात्मा शंकर इसका मुल्यांकन करते हुये इसे क्रमबद्ध मुक्ति की तैयारी के लिये सक्षम उपाय बताये । यह प्रयत्नों की तुलनात्मक मूल्याँकन में अपनी इच्छाओं को ईश्वरीय प्रयोजन में अर्पित करने तथा परम् सत्य के चिन्तन द्वारा अनुभूति करने की अपेक्षा सरल पथ है । बताया जाता है कि वैयक्तिक ईश्वर प्रकृति केवल साधक के सच्चे समर्पण को मान्यता देती है । साधक के अन्य गुणों की कोई वाँक्षना नही होती है । 

शुक्रवार, 9 मई 2014

आत्मावलोकन

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोंहग्रसित अर्जुन को ज्ञान बताया । अर्जुन को ज्ञान सुनकर ऐसा लगाकि उसे बतायेनुसार करना चाहिये । परंतु जैसा कि मनुष्य का स्वभाव होता है कि बताये हुये पर विश्वास कैसे करें । उसने जिज्ञासा व्यक्त किया कि ज्ञान का साक्षात् रूप दर्शन कराइये । गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम इन चक्छुओं से ज्ञान को नहीं देख सकोगे । इसलिये मैं तुम्हे दिब्य चक्छु देता हूँ । दिब्य चक्छु क्या थीं ? चक्छु जो कि सत्यलोक को देख सकें । वर्तमान चक्छु क्या देखती हैं ? माया लोक । माया जो कि सत्य नही है । जो काल के साथ परिवर्तनशील है । सत्य क्या है ? जो समय के साथ परिवर्तित नहीं होता है । परिवर्तनशील वस्तुरूप और चिर दिव्यरूप दोनों को देखने के लिये अलग मानक हुये है । मानक जिसमें व्यवस्था के प्रति निष्ठा है वह दिव्यरूप का दर्शन करायेगा । मानक जिसमें इच्छाओं को मौलिक प्रधानता होगी वह मायालोक तक ही सीमित होंगे । वह सत्यलोक का दर्शन नहीं कर सकेंगे । सत्यलोक निष्ठावान के लिये है । मायालोक भ्रमात्मक छाया को अनुसरण करने वालो का लोक है । मायालोक के निवासी को सत्यलोक में जाने के लिये कोई रोक नहीं है । परंतु सत्यलोक में यदि मायालोक का निवासी बिना चक्छु के जायेगा तो उसकी स्थिति एक अंधे व्यक्ति के समान होगी । इसलिये सत्यलोक में जाना है । सत्यलोक में निवास करना है । तो एक मात्र अंधपन उत्पन्न करने वाली इच्छाओं को त्यागना होगा । इसे त्यागते ही सत्यलोक की सुहावनी अनुकम्पा अमृत का स्वाद मिलेगा ।  

गुरुवार, 8 मई 2014

आत्मदर्शन

बाह्यजगत के समस्त वस्तु संसार के घटको का सज्ञान हम लेते हैं धारणाओं के माध्यम से । धारणायें जो पूर्व से मस्तिष्क में विद्यमान रहती हैं । चाहे ठीक उसी वस्तुरूप की अथवा समता की अन्य वस्तुरूप की । यह धारणायें कायम हुई रहती हैं इंद्रियों द्वारा ग्रहण किये गये ज्ञान के द्वारा । परंतु जब हम अपने अंत:करण में अपनी आत्मा का दर्शन करने के उद्देष्य से प्रयत्न करते हैं तो हमें उपरोक्त बाह्यजगत के लिये वर्णित पद्धति सहायक नहीं होती है । कारण कि हमें आत्मा के स्वरूप अथवा उससे मिलते जुलते किसी अन्यस्वरूप की कोई धारणा पूर्व से हमारे मस्तिष्क के संचित कोष में नहीं होती है । इन कारणों से आत्मदर्शन का लक्ष्य ज़टिल प्रमाणित होता है । प्रयत्न प्रारम्भ करने पर शुरू में हमें जो कुछ भी नया अनुभव सम्मुख होता है जिसका कि बाह्यसंसार के प्रयोजनों में पूर्व में कभी सन्योग नहीं हुआ है वही हमें आत्मस्वरूप के रूप में प्रतीत होता है । परंतु यह आत्मस्वरूप होता नहीं है । इसलिये आत्मदर्शन के प्रयत्न में सर्वप्रथम वाँक्षना बनती है कि हमें अपनी पूर्व की सम्पूर्ण धारणाओं की स्मृति को शून्य करना होगा ।  

बुधवार, 7 मई 2014

आत्मचेतना

आत्मचेतना के जाग्रित हुये बिना जीवन का पूर्ण स्वामित्व सम्भव नहीं हो सकता है । वास्तविकता में आत्मचेतना की जिज्ञासा अपने अंदर विद्यमान जघन्यतम विरोधात्मक स्थिति का ज्ञान पाना है । इस आत्मचेतना को जाग्रित करने के लिये मनुष्य को अपनी शरीर अपने आचरण और अपने मस्तिष्क को एक तारतम्य में बनाना होता है । यह करना तब तक सम्भव नही हो सकता है जब तक उसके अंदर मोंह विद्यमान है । जब मनुष्य का संकल्प सत्यरूप में आत्मचेतना जाग्रित करने के लिये दृढ हो जाता है तब उसके अंत:करण में विद्यमान प्रकृतीय मोंह के प्रति उत्कर्ष भावनायें क्षीण होना प्रारम्भ हो जाती हैं । प्रकृतीय मोंह समाप्त होने की दशा में उसका मस्तिष्क शांत हो जाता है । मस्तिष्क की शांत स्थिति में उसकी आत्मा उस परम् सत्य की उपस्थिति का अनुभव करती है । इस स्थल पर ज्ञातब्य है कि मस्तिष्क में विद्यमान विचारों के तूफान तथा उन विचारों से जनित होने वाली इच्छाओं के वेग से ही सकल अशांति उत्पन्न होती है । इनका दमन ही प्रशस्थ करता है शांति । शांत मस्तिष्क की दशा में ही आत्मचेतना जाग्रित होना सम्भव होता है । मनुष्य अपने अंत:करण में विद्यमान परम् सत्य की उपस्थिति का अनुभव कर सकेगा । मोंह का आवरण ही उसे अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य से दूर किये हुये होता है । आत्मचेतना का जाग्रित होना मानो आच्छादित करने वाले मोंह का नाश करना है । जीवन के सत्य स्वरूप को पाना है । 

मंगलवार, 6 मई 2014

नियंत्रण केंद्र

प्रकृति निर्मित मस्तिष्क । समस्त नियंत्रणों का केंद्र । समस्त विकारों का सृजनस्थल । यहाँ पर सामान्य रूप से चेतन अवस्था के कृत्यों के अतिरिक्त कुछ अर्धचेतन अवस्था के कृत्य भी पोषित होते हैं । कुछ ऐसे कृत्य जिनकी व्याख्या सामान्य चेतन अवस्था के विवेक द्वारा नहीं की जा सकती है । ऐसे कृत्य अतिशय प्रेम अथवा अतिशय घृणा के परिवेश से जनित होते हैं । ऐसे कृत्य मनुष्य कैसे और क्यों करता है इसका उत्तर स्वयँ करने वाला भी नहीं दे पाता है । ऐसे कृत्य जिन्हे कि बाद में जब वह अपने सामान्य चेतन अवस्था में होता है तो स्वयँ भी सोचता है कि मैंने कैसे और क्यों किया था । पश्च्याताप करता है अपने किये हुये का । इना समस्त का प्रभावी नियंत्रण मस्तिष्क के नियंत्रण द्वारा ही सम्भव हो सकता है । जिस प्रकार किसी भठ्ठी में प्रज्वलित आग को नियंत्रित करने का सरलतम उपाय होता है कि उसमें प्रयुक्त ईधन की पूर्ति नियंत्रित की जाय । ईधन ना मिलने की दशा में अग्नि स्वत: शांत हो जावेगी । उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में व्याप्त समस्त अशांति का जन्मस्थल उसका अपना मस्तिष्क की समस्त वृत्तियों को नियंत्रित किया जाय तो निश्चय ही वह दिब्यशांति की ओर अग्रसित होगा । इसी उपलब्धि के लिये उसे अपनाना होगा योगशास्त्र की किसी अनुकूल विधा को । इससे जाग्रित होगी उसमें एक स्थायी चेतना । इस चेतना के जाग्रित होने से उसे प्रतिपल अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की उपस्थिति का बोध बना रहेगा । वह अपने सत्य स्वरूप के अनुरूप कर्म करेगा । संकीर्ण मोंह के जीवन से परे व्यापक मुक्त जीवन के विस्तृत व्यक्तित्व का शांतजीवन जीयेगा । संसार सदैव ऐसा ही रहा है । सदैव ऐसा ही रहेगा । मात्र कोई इसमें कैसे चीज़ों को ग्रहण करता है के अंतर से उसका अपने जीवन का स्वरूप बदल जाता है । समस्त प्रकृति का भोग करें परंतु उसमें बँधे नहीं । मोंह में  बंधना ही दु:ख का निमंत्रण है । इच्छाये होगी तो दु:ख रहेगा ही रहेगा । 

सोमवार, 5 मई 2014

नियंत्रण

परम् सत्य की इस प्रकृतीय शरीर में विद्यमान छाया आत्मा । इस आत्मा पर आच्छादित प्रकृतीय मोंह । विकार । इस विकार का निवारण । योगशास्त्र । योगशास्त्र के प्रचलित तीन विधायें । ज्ञानमार्ग कर्ममार्ग भक्तिमार्ग । इन तीनों ही विधाओं में दो उभयनिष्ट प्रक्रियाओं को प्रबलयोगकारक बताया गया है । प्रथम ध्यान । द्वितीय मस्तिष्क की वृत्तियों का नियंत्रण | ध्यान उस परम् सत्य की उपस्थिति का । परिणामत: आचरण उस परम् सत्य की मर्यादा के अनुरूप । मस्तिष्क की वृत्तियों का नियंत्रण मानसिक संकल्प द्वारा । प्रबल इच्छा शक्ति द्वारा । मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले विविध विचारों का नियंत्रण । मस्तिष्क में जाग्रित होने वाली अनेकानेक इच्छाओं का नियंत्रण । इसके लिये उपयोगी योगा । महर्षि पातँजलि का मत है कि योगा मस्तिष्क की वृत्तियों को नियंत्रित करने की विधा है । इन समस्त नियंत्रणों को प्रभावी रूप से लागू करने पर उपलब्धि होगी परम् सत्य के अपने अंदर विद्यमान होने का सीधा अनुभव । दिव्य जीवन । 

रविवार, 4 मई 2014

शुद्धीकरण

परम् सत्य का ज्ञान पाने हेतु प्रतिपादित धर्मसिद्धांत के नियमों का संग्रह जिसे कि साँख्यदर्शन के शीर्षक अंतर्गत बताया गया उसमें पुरुष (आत्मा) और प्रकृति को दो प्रधान अवयव बताया गया जिनके मध्य भेद पर आधारित संसार के विभिन्न रूप व उनकी समस्त गतिविधियाँ विस्तरित हैं । आत्मा एकमात्र स्थायी अवयव है इस समस्त परिवर्तनशील प्रकृतीय रचनाओं के मध्य । आत्मा मूल स्वरूप में अकार्यकारी इस संसार से भिन्न इस संसार के अवलम्ब से परे इस संसार के मानको से अज्ञेय स्वयंपोषित अवयव है । इसके विपरीत प्रकृति गुणयुक्त है । गुण अर्थात् बाँधने की क्षमता से युक्त । परिणामत: आत्मा प्रकृतीय मोंह में बँध जाता है । प्रकृति इतनी विज्ञानयुक्त है कि वह हर प्रत्येक दशा में आत्मा को अपने मोंह में बाँधने में समर्थ होती ही होती है । इस प्रकार मोंहग्रसित आत्मा असंतुलन का केंद्र बन जाती है । इस असंतुलन का निवारण का विचार ही योगशास्त्र है ।
योगशास्त्र में वर्णित तीन विधायें । प्रथम ज्ञानमार्ग । इस पथ में तीनों अवयवों नामत: आत्मा प्रकृति और मोंह का अलग अलग स्वरूप ज्ञान होना अनिवार्य होता है । फिर आच्छादित करने वाले मोंह का नाश करने की विधि जानना होता है । आत्मा जब पूर्णरूप से प्रकृतीय संसर्ग से मुक्त हो जाता है । मोक्ष की स्थिति है ।
प्रकृति के मध्य रहते । प्रकृतीय गुणों का भोग करते । प्रकृति के संसर्ग से पूर्णरूप से मुक्त । निरंजन । यह आदर्श स्वरूप पाना लक्ष्य होता है । योगशास्त्र । 

शनिवार, 3 मई 2014

साँख्य दर्शन

प्रकृति और पुरुष (आत्मा) दो भिन्न अस्तित्व है । प्रत्येक स्वरूप इन दोनों के सन्युक्त होने से ही सृजित होते हैं । प्रकृति की प्रत्येक रचना समय के साथ परिवर्तित होने वाली होती है । प्रत्येक परिवर्तनशील रचना में विद्यमान पुरुष ही स्थायी अपरिवर्तनशील अस्तित्व होता है । यह अपने मूल स्वरूप में किसी क्रिया का कर्ता नहीं होता है । प्रकृति गुणयुक्त होती है । गुण का अर्थ होता है रस्सी के तीन धागे । रस्सी का नैसर्गिक प्रभाव होता है बंधन । आत्मा जोकि ना ही प्रकृति के अधीन है ना ही प्रकृति के ऊपर आश्रित है और ना ही प्रकृति द्वारा जाना ही जा सकता है फिर भी प्रकृति के गुणों के मध्य रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग करते प्रकृति के मोंह से ग्रसित हो जाता है । यह स्थिति स्वाभाविक संतुलन को भंग करने वाली होती है । समस्त विकारों की जननी होती है । योगशास्त्र इसी विकृति से आत्मा को मुक्त कराने का उपाय सुझाती है । आत्मा और प्रकृति इन दो स्वतंत्र अस्तित्वों को आधार मान कर आत्मा को प्रकृतीय संसर्ग से मुक्त कराने का विज्ञान बताने वाला धर्मदर्शन साँख्यदर्शन । 

शुक्रवार, 2 मई 2014

आत्मा

आत्मा शुद्ध अर्थात किसी भी मिश्रण से मुक्त है । यह किसी क्रिया का कर्ता नहीं होता । इसे स्वयं अपने अंत:करण से अपने अस्तित्व में स्थिर रहने के लिये शक्ति प्राप्त होती है । यह प्रकृति निर्मित किसी स्वरूप की उत्पत्ति नहीं होती । यह प्रकृति निर्मित किसी उत्पत्ति पर आश्रित नहीं होती । यह प्रकृति निर्मित किसी रचना के माध्यम से जानी नहीं जा सकती । प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में विद्यमान आत्मा प्रत्येक दूसरे प्रकृतीय स्वरूप में विद्यमान आत्मा से भिन्न होती है । यह भिन्नता अनंत काल तक भिन्नता के रूप में ही स्थिर रहती है । यह प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होती है ।
प्रकृति के मध्य रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग करते यह प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित कर प्रकृतीय मोंह से आच्छादित हो जाती है ।

योगशास्त्र द्वारा सुझाये गये किसी उद्धार विधि के प्रभाव से यदि कंचिद आत्मा प्रकृतीय सम्बंध से मुक्त हो जाती है तो यह इसके मोक्ष की स्थिति होती है । यह इसकी अपने मूल स्वरूप में वापसी के तुल्य होता है । 

गुरुवार, 1 मई 2014

प्रकृति

परम् सत्य एक पूर्णरूप से पारलौकिक स्वतंत्र स्वत:अस्तित्व है । दूसरी ओर प्रकृति लौकिक जगत की अस्तित्व है । यह स्वतंत्र नहीं हैं । यह परम् सत्य पर आश्रित अस्तित्व है । इसकी रचना घटको के सम्मलित होने से हुई है । इन्ही घटको के समंवय के अनुपात की भिन्नता द्वारा विविध स्वरूप उत्पन्न हुये हैं । इन प्रकृतीय स्वरूपों में सर्वाधिक विज्ञान सम्पन्न रचना मस्तिष्क के नाम से जानी जाती है । प्रकृति गुणयुक्त है । इसके गुणों का वर्गीकरण व अध्ययन द्वारा तीन नाम सम्मुख होते हैं । सत् रज़ तम । प्रकृतीय रचनाओं के भौतिक स्वरूप के विचार में सत्ब हल्कापन रज़ गति तम भारीपन । मस्तिष्क की क्रिया के विचार में सत् अच्छाई रज़ आसक्ति तम लिप्सा । यह तीनों ही गुण बंधनकारी हैं । इन्हे रस्सी के तीन धागों की संज्ञा दी जाती है । इन्ही गुणों के विभिन्न अनुपात में समंवित होनें से विभिन्न स्वरूप सम्भव हुये हैं । इसी प्रकृति के स्खलन द्वारा समस्त सृष्टि की समस्त गतिविधि सम्भव होती है । इसप्रकार समस्त सृष्टि में विस्तरित समस्त स्वरूप समस्त गुण तथा समस्त गतिविधि इसी प्रकृति के अधीन है ।