इस संसार से मुक्त । आत्मा जब मोंह
से मुक्त हो जाय । इस संसार के साथ बँधा है मनुष्य इसी मोंह के द्वारा । मोंह से
मुक्त आत्मा कैवल्य । लोकातीत परम् सत्य की स्थिति तक पहुँचना है मोंह से मुक्त
आत्मा का अनुभव । मोंह से मुक्ति की स्थिति में द्वैत स्वत: समाप्त हो जाता है ।
मोंह से मुक्त आत्मा का परम् सत्य के साथ एकीकरण हो जाता है । इस स्थिति में
प्रकृतीय गुणों की आसक्ति समाप्त हो जाती है । मुक्त स्वतंत्र आत्मा शांति की
अनुभूति करता है । मुक्त आत्मा संसार के प्रक्रियाँओं में संलग्न होती है परंतु
उनमें लिप्त नहीं होती है ।
सोमवार, 30 जून 2014
रविवार, 29 जून 2014
योगा
मस्तिष्क की स्वतंत्र वृत्ति को
विजय करना योगा है । इच्छाओं के लोक में भ्रमण करते मस्तिष्क को परम् सत्य के विधान
के अनुरूप कार्य करने के लिये नियंत्रित करना योगा द्वारा सम्भव होता है । कार्य करते
हुये कार्य के परिणाम से मोंह ना होना । यह योगा की मूल वाँक्षना है । सन्यास ।
कार्य के परिणाम से सन्यास । कार्य किया जाय । फल की लिप्सा ना रहे । इस अभ्यास से
मस्तिष्क के उद्वेग शांत होते है । शांत मस्तिष्क प्रकृति के कर्ता स्वरूप को
ग्रहण करता है । ज्ञान प्रगट हो जाता है । अज्ञेय ज्ञेय हो जाता है ।
शनिवार, 28 जून 2014
प्रकृति और पुरुष
जितना कुछ संसार दीख रहा है सब
प्रकृति है । जो कुछ भी संसार में हो रहा है सब की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति जो
कुछ भी कर रही है वह पुरुष के द्वारा ही सम्भव हो रहा है । पुरुष अदृष्य है अज्ञेय
है । जो भी ज्ञान सम्भव है उसका माध्यम मस्तिष्क होता है । अज्ञेय को जानना ज्ञान
है । इसलिये मस्तिष्क का नियंत्रित व संयमित संचालन ही ज्ञान पाने की सफलता है ।
यही रहस्य कुँजी है । इच्छाओं द्वारा मस्तिष्क दूषित होता है । ज्ञान सम्भव नहीं
रह जाता है ।
शुक्रवार, 27 जून 2014
संकल्प विकल्प
मनुष्य मोंह से ग्रसित सदियों से
जीवनयात्रा करता आया है । मस्तिष्क अपनी सामान्य क्रिया प्रणाली में अनेको विकल्प
किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिये प्रस्तुत करता है । सामान्य अभ्यास में कोई भी
उन्ही विकल्पों में से चुनाव कर कोई कार्य करने की प्रथा का अनुसरण कर चलता आया है
। इसलिये जब उसे आध्यात्म को बताया जाता है, प्रकृति के कर्ता स्वरूप को बताया
जाता है तो सहसा उसे लगता है कि अपनाने योग्य बाते हैं । परंतु जब उसे अपने
सामान्य अभ्यास जिसके अंतर्गत वह अपने मस्तिष्क के द्वारा प्रस्तुत अनेकों
विकल्पों में से चुनने का पथ त्याग प्रकृति की अपेक्षानुसार कर्म चुनने को कहा जाता
है तो उसे लगता है कि हम तो शायद कहीं के नहीं रह जायेंगे । हम अपने दिमाग के
मार्ग प्रस्ताव को कैसे त्याग दे । यह जो संकल्प विकल्प मस्तिष्क में उत्पन्न होता
है जिससे वह अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाता है । यह बडी ही घातक स्थिति होती है
। इसपर विजय सबसे पहला आवश्यक स्थल होता है ।
गुरुवार, 26 जून 2014
वास्तविक लक्ष्य
मनुष्य अपने अंदर विद्यमान परम्
सत्य की छाया को अनुभव कर सके, उसकी गरिमा के अनुरूप जीवन जी सके तो यह चर्मोत्कर्ष
उपलब्धि होगी । इसे पाने के लिये चाहे वह चिंतन व ध्यान का पथ अपनावे, चाहे प्रेम और समर्पण का पथ अपनावे अथवा कर्म फल से सन्यास को धारण कर कर्म
करे सभी उपलब्धि काल में भिन्न पथ होते हुये भी अंतिम गंतब्य पर अनुभव होने वाली
परम् सत्य की अनुभूति एक समान ही होगी । उपरोक्त तीनों ही विधायें आच्छादित करने
वाले मोंह का ही निवारण करने को लक्षित हैं । इस प्रकार यदि कहा जाय कि परम् सत्य
की अनुभूति यदि एक शरीर है तो ज्ञान इसके चक्छु हैं, स्नेह और प्रेम इसका हृदय है और
सन्यास इसकी कर्म प्रणाली है । योगा जहाँ ध्यानऔर ज्ञान का प्रतीक है वहीं प्रेम
और सेवा वह प्राचीन पथ है जिससे ज्ञान की मंजिल मिलती है ।
बुधवार, 25 जून 2014
आत्मनियंत्रित जीवन
आत्मा का विक्षेप मोंह जिसके हट
जाने पर आत्मा परम् सत्य के सम्मुख शाश्वत् रूप में हो जाती है । इस शाश्वत् रूप
में वह परम् सत्य की मर्यादा को समर्पित उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य में
संलग्न होती है । इस स्तर के नियंत्रित जीवन में कोई कर्म बंधनकारी नहीं रह जाता
है । मुक्त नियंत्रित आत्मा ही श्रेष्ठतम उपलब्धि होती है । इस स्थिति को पाने के
लिये भक्ति और कर्म दोनों ही साधन के रूप में होते हैं । भावुक प्रकृति के लोगों के
लिये भक्ति सुगम होती है । कर्मशील और आत्मविश्वासी लोगो के लिये कर्म पथ सुगमहोता
है । आत्मनियंत्रित लोगों को ही ज्ञान मिलता है ।
मंगलवार, 24 जून 2014
यज्ञ की आहुति
इस कर्म प्रधान संसार में
नियंत्रित मुक्त आत्माधारक व्यक्ति द्वारा बिना कर्मफल की आकाँक्षा से किया हुआ
कर्म आहुति है । परम् सत्य के प्रयोजन हेतु एक यंत्रवत् कार्य में संलग्न होने
वाले संत के द्वारा किया गया कर्म ही उस परम् सत्य की प्रतिष्ठा में अर्पित की गई
आहुति होती है । कर्म प्रधान संसर ही यज्ञ स्वरूप है ।
सोमवार, 23 जून 2014
कर्मयोग
योग की मस्तिष्क की दशा में किये
जाने वाला कर्म । यह साधन होता है आत्मा की मोंह से मुक्ति हेतु । कर्म मुक्ति
नहीं है । कर्म को एक विषेस मानसिक दशा में करने का अभ्यास बनाने से साधक व्यक्ति
की आत्मा मोंह के बंधन से मुक्ति पाती है । मुक्त व्यक्ति भी कर्म करता है । कर्म
तो तब तक करना है जब तक जीवन है । परंतु मुक्त व्यक्ति का कर्म बंधनकारी नहीं होता
। बंधन अर्थात एक कर्म के फल से दूसरे नये कर्म का उदय । यह कर्म बंधन है । एक
कर्म किया और वह कर्म वहीं पूर्ण । यह
मुक्ति है । कर्मयोग मोहाशक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति का उपाय है । समस्त दु:ख
कलह यह कर्म बंधन का फल है । शांति आनंद यह मुक्ति का फल है । प्रकृतीय गुणों का
मोंह । सतगुण, रजोगुण, तमोंगुण इन्ही का मोंह बंधन है । इन तीनो को त्यागने
वाला विरागी है । जिसने इन तीनों गुणों को त्यागा वही विरागी है । वही सुखी इंसान
है ।
रविवार, 22 जून 2014
साधना और लक्षणा
जीवन के सत्य को जानना । अपने अंदर
विद्यमान उस परम् सत्य की छाया को जानना । यह दोनो ही एक दूसरे के पर्याय हैं । इस
सत्य को जानने के लिये भक्ति और कर्म दो मार्ग है । ना ही भक्ति और ना ही कर्म कोई
भी सत्य का रूप बोध नहीं हैं । यह दोनो ही साधन मात्र हैं । उस परम् सत्य को जानने
के लिये । उसका ज्ञान हो जाने पर भी कर्म व्यक्ति करेगा । परंतु कर्म को दायित्व
के रूप में नहीं करेगा बल्कि कर्म उसकी पहचान होगा । कर्म करने के लिये तो जन्म ही
हुआ है । कर्म करने का निमित्त निर्धारित करता है कि कर्म बंधन को प्रशस्थ करने
वाला है कि मुक्ति को । ज्ञानी का कर्म इच्छा की पूर्ति का नहीं अपितु कर्म के
यंत्र के द्वारा किया हुआ कर्म होता है । ज्ञानी का कर्म साधना नहीं लक्षणा होता
है ।
शनिवार, 21 जून 2014
आत्मबोध का जीवन
हम प्रत्येक की वास्तविक पहचान हम
प्रत्येक के अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया है । यदि कंचिद हम प्रत्येक उस परम्
सत्य की अपने अंदर उपस्थिति को अनुभव कर सकें और उसकी मर्यादा के अनुकूल जीवन जी सकें तो
यह वास्तविक स्वरूप होगा जिसमें वह हमसे अपेक्षा करता है । हम प्रत्येक उस परम्
सत्य के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेंगे और इस व्यापक सृष्टि के वृहद् प्रयोजन
के लिये प्रयोज्य होंगे । संकीर्ण स्वार्थ अथवा स्व-इच्छा की जेल से मुक्त हो
सकेंगे । स्वार्थ और इच्छाओं की उपस्थिति यह इंगित करती है कि हम उस परम् सत्य की
अपने अंदर उपस्थिति से अनभिज्ञ हैं । यह अज्ञान ही हमें संकीर्ण मोंह के बंधन में बाँधता
है । इन समस्त व्याधियों से मुक्ति है अपने अंदर उस परम् सत्य की उपस्थिति का
अनुभव करना । इस अनुभूति द्वारा हम संकीर्णता की कैद से मुक्त होकर व्यापक सत्य के
लोक में जीवन जीयेंगे । हमें हर प्रत्येक प्राणी में वह परम् सत्य उपस्थित दिखाई
देने लगेगा । हममें हर प्रत्येक के प्रति बंधुत्व का भाव जाग्रित होगा ।
शुक्रवार, 20 जून 2014
द्वैत से परे
जो मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूर्ण
शून्य कर अपने को व्यापक प्रकृति के एक तुच्छ साधन के रूप में कार्य के लिये
प्रस्तुत करता हैं वह मानों द्वैत से ऊपर ऊठ कर परम् सत्य के प्रयोजन का एक यंत्र
बन जाता है । ऐसी स्थिति प्राप्त हो जाने पर कार्य के परिणाम उसकी मानसिक स्थिति
को विचलित नहीं कर सकते हैं । वह कार्य करते हुये भी कार्य का कर्ता नहीं रह जाता
है । द्वैत परम् सत्य व प्रकृति में होता है । प्रेरक परम् सत्य कर्ता प्रकृति कर्म
को करने वाला एक यंत्र मात्र मानों द्वैत को स्वीकार कर द्वैत से परे हट कार्य में
संलग्न है । उसका तो मात्र एक लक्ष्य है अपना धर्म । एक यंत्र के रूप में कर्ता ।
गुरुवार, 19 जून 2014
नियंत्रित प्रकृति
परम् सत्य की रचना प्रकृति उन्ही
के पूर्ण नियंत्रण में इस सृष्टि का समस्त कार्यों को करने की कर्ता है । समस्त
प्राणी प्रकृति की रचना हैं । प्रकृति के कर्मों को करने के साधन मात्र हैं ।
प्रकृति द्वारा आरोपित एवं अपेक्षित कर्मों को करना ही हमारी मर्यादा है । मर्यादा
के अनुरूप कर्म करना ही हमारा धर्म है । मस्तिष्क में इच्छाओं का निवेश बाधित करता
है प्रकृति की आज्ञा को जानने से । यदि प्रकृति की अपेक्षाओं को यथास्वरूप जानना
है तो हमें अपनी इच्छाओं को पूर्ण नियंत्रित करना होगा । अन्यथा अपनी इच्छायें ही
प्रकृति के आदेश का भ्रामक स्वरूप प्रगट करती रहेगी । हम अपने धर्म के विपरीत
कार्यों में संलग्न होते ही रहेंगे ।
बुधवार, 18 जून 2014
आत्मज्ञान का साधन
कर्म अथवा भक्ति आत्मज्ञान के लिये
साधन हैं । आत्मज्ञान स्वतंत्र अनुभूति है जो कि आत्मा पर आच्छादित मोंह का नाश
होने पर ही मिलती है । परंतु इस आच्छादित करने वाले मोंह का नाश करने के लिये कर्म
अथवा भक्ति साधन हैं । कर्म अथवा भक्ति आत्मज्ञान नहीं है । आच्छादित करने वाला
मोंह होता बहुत बिकट है । यह व्याधी अनादिकाल से आत्मा को ग्रसित किये हुये होती
है । इससे मुक्ति के लिये दृढ और सतत प्रयत्न की आवश्यकता होती है । इस प्रयत्न के
लिये सही मानसिक स्थिति में कर्म करना अथवा पूर्णसमर्पण से भक्ति द्वारा मोंहको
नाश करने का प्रयास उपलब्धि कराता है ।
मंगलवार, 17 जून 2014
समर्पित प्रतिनिधि
अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की
छाया का अनुभव । उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप जीवन । परम् सत्य ही समस्त
कर्मों का प्रेरक है । इस सत्य को स्वीकार करके अपने को परम् सत्य के प्रयोजन के
लिये एक यंत्र के रूप में उसे अर्पित करना । यही आदर्श अपेक्षित स्वरूप है । हम
परम् सत्य के प्रयोजन के लिये एक समर्पित यंत्र हैं । यह जीवन का स्वरूप जो भी कोई
बना सकेगा उसे अनुभव हो सकेगा परम् सत्य के चिर शांति का प्रसाद । उसके कर्म
बंधनकारी नहीं होंगे ।
सोमवार, 16 जून 2014
आत्मचेतना
अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की
छाया की अनुभूति कर्म के माध्यम से करने के लिये अपने को उस परम् सत्य के यंत्र के
रूप में प्रस्तुत करना होगा । अपने स्वभाव व बाह्य कर्म में एकरूपता पैदा करनी
होगी । परम् सत्य बिलकुल अलौकिक अस्तित्व है । उसके अलौकिक गरिमा के अनुरूप हमें
भी प्रकृतीय मोंह से अपने को मुक्त करना होगा । परम् सत्य की अपेक्षा के अनुरूप
हमें उस परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप आचरण बनाना होगा । प्रतिपल यह स्मरण रखना
होगा कि हमारे अंदर जो हमारी पहचान है वह वही परम् सत्य है । उसकी अपेक्षानुसार
कर्म करने से कर्म बंधनकारी नहीं रह जावेंगे ।
रविवार, 15 जून 2014
पुरुषोत्तम का कर्म
पुरुषोत्तम कर्म करते हुये भी कर्म
का कर्ता नहीं होता है । उसकी आत्मा प्रकृतीय मोंह से मुक्त होने के कारण कार्य को
प्रेरित करती है परंतु कर्तापन के बोध से मुक्त रहती है । कार्य का प्रेरक परम्
सत्य है । यह सत्य पुरुषोत्तम के मस्तिष्क में स्पष्ट स्थायी विद्यमान रहता है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम थे । राजा जनक पुरुषोत्तम थे । पुरुषोत्तम कर्म
करता है परंतु एक अज़नवी की भाँति । ना ही कर्म का निमित्त उसका है । ना ही कर्म का
कारण उसका है । वह बस कर्म करता है । वह विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान की
मर्यादानुसार कर्म करता है । पुरुषोत्तम का जीवन इसी प्रकृतीय ढाँचे में होता है
परंतु इस प्रकृतीय शरीर के लिये नहीं होता है । वह इस संसार में रहता अवश्य है
परंतु उसका जीवन परम् सत्य में लीन जीवन होता है । उसका कार्य होता तो वैसे ही है
जैसे कि एक मोंहाशक्त का कार्य होता है परंतु उसमें मोंह नही होता है ।
शनिवार, 14 जून 2014
पुरुषोत्तम
आम मनुष्य इस प्रकृति निर्मित
संसार में प्रकृतीय गुणों में मोहित इन्ही सांसारिक विषयों में लिप्त सुख दु:ख का
भोग कर रहा है । जो मनुष्य परम् सत्य के अंश आत्मा में अपने को केंद्रित करता है
वह ब्रम्ह की शांति में इस स्तर तक खो जाता है कि उसे आम जीवनके कोलाहल का भास
नहीं रह जाता है । इन दोनो ही स्थितियों से परे एक ऐसे मनुष्य की कल्पना जो कि
संसार के प्रत्येक दायित्व का निर्वाह करते संसार के विषयों में संलग्न रहते हुये
भी किसी मोंह अथवा आसक्ति में नहीं बन्धता है । ऐसा सम्भव होता है उसके कार्य करने
के विज्ञान के बल से । ऐसे मनुष्य को ही पुरुषोत्तम कहा जाता है ।
शुक्रवार, 13 जून 2014
निर्लिप्त कर्म
कर्म करने की सवतंत्रता है । कर्म
फल में लिप्सा वर्जित है । मुक्ति और बंधन का विशाल भेद इसी उपरोक्त दो तथ्यों में
निहित है । प्रकृति का संसार हर प्रत्येक प्रकार के कर्मों को सम्मुख किये हुये है
। सभी कर्मों को मनुष्य ही कर रहा है । कोई कर्म हेय नहीं है । प्रकृति ने किस
व्यक्ति को किस कर्म के लिये बनाया है यह प्रकृति ही जानती है । यदि हम प्रकृति की
अपेक्षानुसार कर्म कर रहे हैं तो उस कर्म में मेरा कर्तापन तो है नही । हमतो मात्र
एक यंत्र रूप में उसे कर रहे हैं । इसलिये उस कर्म के अच्छे बुरे के साथ मेरा नाम
सम्बद्ध करना औचित्यपूर्ण नहीं होगा । यही स्वरूप चरितार्थ करना अपेक्षित होता है
। यही मुक्ति है । उस कर्म के कर्तापन में सम्मलित ना हुआ जाय । कर्ता तो प्रकृति
है । हमतो मात्र उस प्रकृति के एक यंत्र हैं । जब प्रकृति जैसा करा रही है हम कर
रहे हैं ।
गुरुवार, 12 जून 2014
कर्तव्य कर्म
आम जीवन का अभ्यास इच्छाजनित कर्मों को करने का है । इसलिये
उपरोक्त वृतांत सहसा विश्वसनीय नहीं प्रतीत होगा । परंतु उपरोक्त वृतांत इतना सत्य
है जितना की सूर्य का प्रकाश । यह बात सिद्धांतरूप में समझकर जीवन में इसका सत्य
अनुभव स्वयँ करें तो अधिक सार्थक परिणाम प्रगट होगा । प्रकृति की अपेक्षा ही हमारा
कर्तब्य है । यह इच्छाओं के विद्यमान रहते प्रगट नहीं होता है । इच्छाओं के शून्य
होने पर इसका स्वच्छ स्वरूप विदित होगा ।
बुधवार, 11 जून 2014
कर्तव्य कर्म
जो संत अपनी इच्छाओं को पूर्णरूप
से नियंत्रित कर चुका है । जो कर्म को यंत्रवत् करता है । जो कि परम् सत्य का
प्रतिनिधि बन गया है । उसके लिये प्रकृति की अपेक्षा ही उसका कर्तब्य स्वरूप हो
जाता है । उसके लिये कर्म के फल का कंचिद कोई महत्व रह ही नहीं जाता ।
आम जीवन का अभ्यास इच्छाजनित
कर्मों को करने का है । इसलिये उपरोक्त वृतांत सहसा विश्वसनीय नहीं प्रतीत होगा ।
परंतु उपरोक्त वृतांत इतना सत्य है जितना की सूर्य का प्रकाश । यह बात सिद्धांतरूप
में समझकर जीवन में इसका सत्य अनुभव स्वयँ करें तो अधिक सार्थक परिणाम प्रगट होगा
। प्रकृति की अपेक्षा ही हमारा कर्तब्य है । यह इच्छाओं के विद्यमान रहते प्रगट
नहीं होता है । इच्छाओं के शून्य होने पर इसका स्वच्छ स्वरूप विदित होगा ।
मंगलवार, 10 जून 2014
मुक्ति
कर्मों की कर्ता प्रकृति है ।
कर्मों का प्रेरक आत्मा है । इस सत्य की मर्यादा को समझते हुये यदि कोई कर्म करता
है तो उसके कर्म बंधन नहीं होंगे । बंधन सदैव इच्छाओं की पूर्ति में किये गये
कर्मों द्वारा ही सम्भव है । कर्म के परिणाम से दूसरे नये कर्म की उत्पत्ति । जब
प्रेरक आत्मा कर्ता प्रकृति के कर्मों को ही प्रेरित करेगा तो उसे कर्म के फल से
कोई सरोकार नहीं होगा । परिणामत: कर्मबंधनकारी नहीं रह जावेगा ।
सोमवार, 9 जून 2014
कर्म के यंत्र
यदि कंचिद हमारी शरीर, इंद्रियाँ, विवेक, मस्तिष्क एक यंत्र के रूप में कर्ता प्रकृति के
कर्मों को करने वाले बनजाते हैं तो अभीष्ट स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं । परम्
सत्य की अपेक्षा के अनुरूप । अनंतकाल से हम सभी परिणाम की भ्रमात्मक अपेक्षा के पीछे
अपनी समस्त ऊर्जा व्यय करते आये हैं । इस भ्रम से उबरना ही लक्ष्य की प्राप्ति
होगी । एक कर्म के परिणाम से दूसरे नये कर्म का उदय होता ही जावेगा । इसका कहीं
अंत नहीं है । जिस पल इस भ्रम को पहचान जायेंगे और अपने को परम् सत्य के प्रयोजन
की पूर्ति का यंत्र बना देंगे तत्काल ही मुक्त हो जावेंगे । कार्य के परिणाम की
कोई रूचि नहीं रह जावेगी । प्रेरक भी वही है । प्रयोजन भी उसी का है । हमको परिणाम
से क्या काम । हमतो मात्र सेवक हैं । सेवा मेरा धर्म है । अपेक्षित दायित्व
निर्वाह ही सम्पूर्ण लक्ष्य है । इस स्थिति को पाने के लिये केवल त्यागना है स्वयँ
की इच्छाओं को । अपने को उस परम् सत्य के प्रयोजन का यंत्र बना देना ही लक्ष्य
करना योग्य प्रयत्न है ।
रविवार, 8 जून 2014
परम् सत्य के प्रतिनिधि
परम् सत्य को अपने को समर्पित कर आप
परम् सत्य के दिव्य रूप को प्राप्त कर लेते हैं । आप के कर्म परम् सत्य के कार्य
हो जाते हैं । आप का मस्तिष्क, इंद्रियाँ, विवेक सभी उस परम् सत्य के प्रयोजन के यंत्र बन जाते
हैं । आपके कर्म परम् सत्य के प्रयोजन को प्रगट करने वाले बन जाते हैं । परम् सत्य
के वृहद प्रयोजन के आप एक सूक्ष्म अंश के रूप में आपका व्यक्तित्व हो जाता है । यह
संसार परम् सत्य का एक वृहद प्रयोजन हैं जिसमें उन्होने प्रत्येक एकाकी व्यक्ति को
किसी प्रयोजन विशेस के लिये रखा है । यदि हम आप उस परम् सत्य के उस विशेस प्रयोजन
को पूर्ण करते हैं तो ही हमारे आपके जीवन का सही प्रयोग है । स्वयँ की इच्छाओं की
पूर्ति में किये जाने वाले कर्मों की कोई मान्यता नहीं होती । इन्हे पूर्णरूप से
त्यागना ही श्रेयस्कर है ।
शनिवार, 7 जून 2014
कर्तव्य का अंत
वह संत पुरुष जिसकी समस्त इच्छायें
समाप्त हो चुकी हैं उसका इच्छागत कर्तब्य दायित्व समाप्त हो जाता है । ऐसा संत
अपने जीवनकाल पर्यंत कार्य तो करेगा परंतु उसका कोई कर्तब्य दायित्व नहीं होगा ।
उसका समस्त कार्य परम् सत्य की कर्म प्रेरणा द्वारा उसकी सेवा में होगा । इस स्थल
पर ज्ञातब्य है कि कोई भी व्यक्ति जिसभी कर्म को अपना कर्तब्य दायित्व बताता है वह
उसकी अपनी इच्छाओं की पूर्ति में ही होता है । जिस संत की इच्छायें नियंत्रित हो
गई उसका समस्त कार्य परम् सत्य की सेवा में उसी द्वारा पैदा की गई प्रेरणा द्वारा होता
है । यह एकाकी की अनंत में पूर्ण समर्पण की स्थिति होती है । इसका उद्देष्य परम्
सत्य के प्रयोजन में अपने को अर्पित करना है । इस स्थिति के संत के किसी कर्म में
किसी दोष की सम्भावना शेस नहीं रह जाती है । कर्म बंधनकारी नहीं रह जाता है ।
शुक्रवार, 6 जून 2014
सत्य स्वरूप
ज्ञान का जो स्वरूप विगत अनेको
अंकों में लिखा जाता रहा है । उसकी एक अलग छवि । इस सृष्टि में जो भी कर्म किये जा
रहे हैं उनकी कर्ता प्रकृति है । सृष्टि का समस्त विस्तार प्रकृति है । प्रकृति
परम् सत्य की रचना है उत्पत्ति है । समस्त कर्मों के प्रेरक परम् सत्य स्वयं हैं ।
आत्मा परम् सत्य का अंश है । इस सृष्टि में नित्यकर्ता है । यह तथ्य आत्मसात् होना
ही ज्ञान है । ज्ञान होना ही शांति की उपलब्धि है । आनंद है ।
गुरुवार, 5 जून 2014
चर्मोत्कर्ष सरलता
कर्म प्रेरणा का श्रोत - इच्छा का पूर्णमर्दन एक ऐसे शांत सरल शून्य स्थिति को सृजित करने वाला होता
है जिसमें कर्ता व्यक्ति का कोई कर्म दायित्व शेस नहीं रह जाता है । ऐसे संत को
कोई कर्म करने की कोई अभिलाषा शेस नहीं रह जाती है और ना ही किसी फल को पाने की
कोई आकाँक्षा ही रह जावेगी । ऐसा कर्मयोगी उस परम् सत्य में समाहित जीवन जीता है ।
उसका अपना अलग कोई अस्तित्व नहीं शेस रह जाता है । वह पूर्णरूप से उस परम् सत्य का
प्रतिनिधि बनकर समस्त कर्म करता है । उसका कोई भी कर्म उसका अपना नहीं होता अपितु
वह परम् सत्य के आदेश को कर्म में रूपांतरित करता है । यह स्वरूप अपने को पूर्णरूप
से परम् सत्य को अर्पित करना है । पूर्णसमर्पण । पूर्णविलय । चरमोत्कर्ष सरलता ।
बुधवार, 4 जून 2014
कर्म के स्वामी
कर्म और उसके स्वाभाविक फल भोग की
सामान्य प्रक्रिया को आमूल समाप्त कर निरापद यथावाँक्षित कर्म करते हुये अपने कर्म
के स्वामी बन सकते हैं । ऐसा करने में रंचमात्र परम् सत्य के कार्य विधान में किसी
हस्तक्षेप की कोई सम्भावना नहीं होगी और समस्त कर्म अपने स्वाभाविक क्रम में
गतिमान रहेंगे । ऐसा करने में कर्ता व्यक्ति का सीधा सम्बंध उस अखण्ड कर्ता शक्ति
के साथ होगा जो समस्त सृष्टि के कर्मों की कर्ता है । कर्ता व्यक्ति का कर्म उस
अखण्ड शक्ति के कर्म का प्रतिनिधित्व करने वाला होगा । ऐसे में कर्म बंधनकारी नहीं
होंगे । कर्म और कर्मों का फल भोगने के लिये अगला जन्म यह प्रक्रिया इसी वर्तमान
जन्म में समाप्त किया जा सकता है यदि कंचिद हम अपने कर्मों के स्वामी बन जाँय । यह
समस्त उपलब्धि लम्बित है मात्र कर्म करते हुये कर्म फल की इच्छा से विरक्ति और
किये जाने वाले कर्म को परम् सत्य को अर्पित करते हुये कर्म करने की धुरी पर ।
मंगलवार, 3 जून 2014
शाश्वत् सत्य
शाश्वत् परम् सत्य जो कि अपरिवर्तनीय चिर सत्य है वह किसी
परिवर्तनशील क्षणभँगुर कर्म द्वारा नहीं जाना या पाया नहीं जा सकता है । परंतु कर्म
आधार तैयार करता है जिससे परम् सत्य को पाया जा सके । मुक्ति ज्ञान से ही सम्भव
होती है । परंतु ज्ञान सही धारणा के बिना नहीं सम्भव होगा । इसलिये सही धारणा के
लिये सही मानसिक स्थिति में प्रभु को समर्पित कर्म करना परम् आवश्यक वाँक्षना है ।
इस प्रकार प्रभु को समर्पित भाव से किया गया कर्म यज्ञ की आहुति के समान हो जाता
है । यह अपने अस्तित्व को प्रभु के दिव्य अस्तित्व को अर्पित करने के तुल्य होता
है । ऐसे कर्म द्वारा मस्तिष्क पवित्र होता है । कर्म बंधनकारी नहीं रह जाते
सोमवार, 2 जून 2014
ज्ञान द्वारा मुक्ति
अज्ञान ही बंधन है । सत्य स्थिति
का ज्ञान ना होना अज्ञान है । अज्ञान के प्रभाव से बंधन होता है । मोंह में बंधन ।
उपरोक्त समस्त का विलोम । सत्य स्थिति की जानकारी होना ही ज्ञान है । ज्ञान का प्रादुर्भाव ही अज्ञान का नाश है ।
अज्ञान के नाश से सम्भव होगी मुक्ति । मोंह से मुक्ति । सत्य एक ही है । उस सत्य
को समर्पित होना ही मुक्ति है । प्रत्येक कर्म को उसी सत्य को समर्पित कर करें ।
प्रत्येक कर्म को उसी सत्य की सेवा समझ कर करे । प्रत्येक कर्म को उसी सत्य का
आदेश रूप में ग्रहण कर करें । यही अभ्यास मुक्ति का पथ है ।
रविवार, 1 जून 2014
व्याधि और निदान
यदि कंचिद किसी कार्य करने की
पद्धति से शत्रुता है तो यह शत्रुता कार्य से नहीं है अपितु कार्य द्वारा निर्वाण
उपलब्ध करने की प्रक्रिया से है । सत्य का ज्ञान पाने के लिये सत्य स्थिति से
अनभिज्ञता सबसे प्रबल शत्रु होता है । अज्ञान यदि कंचिद मूल व्याधि है तो इस
व्याधि का एकमात्र सरताज इलाज़ ज्ञान है । अपरिवर्तनीय सत्य का ज्ञान परिवर्तनशील
कार्य द्वारा नहीं सम्भव हो सकता है । सही मन:दशा द्वारा कर्म के अभ्यास द्वारा
सत्य के ज्ञान का आधार निर्मित होता है।
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