प्रपत्ति का पूर्ण स्वरूप विकसित
होने में (1) अनुकूलस्य संकल्प: - सभी के प्रति सद्भाव (2) प्रतिकूलस्य वर्जनं – दुर्भावना वर्जित (3) रक्षिस्याति विस्वास: - प्रभु रक्षा करेगा में अडिग
विश्वास (4) गोपतृत्व वर्णं – प्रभु की ओर रक्षा के विश्वास से घूमना (5)
कार्पण्यम् – असहाय का अहसास (6) आत्मनिक्षेप: - पूर्ण आत्मसमर्पण । इन छ: चरणों में अंतिम
चरण ही लक्षित उपलब्धि होती है । शेस पाँच चरण मंजिल पाने की क्रमबद्ध स्थितियाँ
हैं ।
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