समस्त दृष्य संसार प्रकृति है ।
प्रकृति ही मूल अवयव भी है, प्रकृति ही स्वरूप भी है, प्रकृति ही विस्तार भी है, प्रकृति ही संचार भी है, प्रकृति ही प्राण भी है । प्रकृति ही बंधन है ।
प्रकृति ही कर्ता है । प्रकृति ही समस्त स्वरूप में निहित विज्ञान भी है । समस्त
शक्तियों से युक्त होते हुये भी प्रकृति प्रेरक नहीं है । प्रकृति का स्वरूप यदि
ग्राह्य हो जाय तो जीवन यापन सुगम हो जाय । प्रकृति के स्वरूप की अंधता ही समस्त
भ्रमजाल में भटकना है । ज्ञानी पुरुष प्रकृति को सदैव समर्पित भाव से आदर करता है
। उसकी कृपा की याचना करता है । उसके आदेश को नतमस्तक हो शिरोधार्य करता है । जीवन
क्लिष्टताओं से मुक्त होगा तो शांति की उपलब्धि होगी । शांति सत्कर्मों के लिये
मूल आधार है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें