मुक्त आत्मा के धारक का जीवन
मस्तिष्क और शरीर उस परम् सत्य की अनुभूति द्वारा मोंह के आच्छादन से पूर्ण मुक्त
एक ज्योति के समान सत्य से प्रकाशित आभा के रूप में प्रगट होता है । उसका
व्यक्तित्व का चर्मोत्कर्ष उत्कर्ष जिसमें हर्ष की मुद्रा स्वतंत्र
अभिव्यक्ति किसी भी कलुषता के कलंक से रहित उत्कृष्टतम स्वरूप उदय होता है । वह
मानों अपनी उपलब्धि को समस्त मानव समाज में वितरित कर देना चाहता है । उसका जीवन
एक प्रतीक स्वरूप हो जाता है जिसे देख हर मोंह में आसक्त व्यक्ति प्रेरणा ग्रहण
करे कि मुक्त जीवन ही आदर्श जीवन रूप है जिसे पाने के लिये हर सम्भव प्रयत्न किया
जाय ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें