किसी भी मनुष्य के जीवन में दो
मूल्यों (1) वह अ[पने अंदर विद्यमान परम् सत्य के अंश आत्मा का कितना सम्मानजनक
उपयोग करता है (2) प्रकृतीय मोंह में कितना आसक्त है, के मध्य क्या संतुलन है, निर्धारित करता है उस व्यक्ति का जीवन स्तर । कोई भी मनुष्य पूर्णरूप से ना
ही अपनी इच्छाओं का पूर्णनियंत्रण कर आत्मा के ईश्वरीय सम्मान को निर्विवाद रूप से
स्थापित कर सका है और ना ही कोई इतना चर्मोत्कर्ष आसक्त ही है जो रंचमात्र भी
ईश्वर के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता है । इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के जीवन का
भेद इसी दो मूल्यों के तुलनात्मक संतुलन के द्वारा निर्धारित होता है । जो सचेष्ट
हो अपने अंदर ईश्वरीय मर्यादा को पूर्णरूप से स्थापित करने को प्रयत्नशील होता है
उसका जीवन अधिक शांत और आनंद को प्राप्त होता होता है । जो बिना विचारे आसक्ति में
लिप्त रहता है वह अधिक अशांत और दु:ख की स्थितियों के मध्य जीवन बिताता है ।
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