सोमवार, 23 जून 2014

कर्मयोग

योग की मस्तिष्क की दशा में किये जाने वाला कर्म । यह साधन होता है आत्मा की मोंह से मुक्ति हेतु । कर्म मुक्ति नहीं है । कर्म को एक विषेस मानसिक दशा में करने का अभ्यास बनाने से साधक व्यक्ति की आत्मा मोंह के बंधन से मुक्ति पाती है । मुक्त व्यक्ति भी कर्म करता है । कर्म तो तब तक करना है जब तक जीवन है । परंतु मुक्त व्यक्ति का कर्म बंधनकारी नहीं होता । बंधन अर्थात एक कर्म के फल से दूसरे नये कर्म का उदय । यह कर्म बंधन है । एक कर्म किया और  वह कर्म वहीं पूर्ण । यह मुक्ति है । कर्मयोग मोहाशक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति का उपाय है । समस्त दु:ख कलह यह कर्म बंधन का फल है । शांति आनंद यह मुक्ति का फल है । प्रकृतीय गुणों का मोंह । सतगुण, रजोगुण, तमोंगुण इन्ही का मोंह बंधन है । इन तीनो को त्यागने वाला विरागी है । जिसने इन तीनों गुणों को त्यागा वही विरागी है । वही सुखी इंसान है ।  

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