भक्त का एकमात्र लक्ष्य होता है
प्रभु की सेवा । भक्त का एकमात्र साधन है प्रेम । भक्त प्रेयसी प्रेम की
अभिव्यक्ति में चाहे प्रभु के चरण धोये अथवा उनकी आरती करे उसका एक ही भाव प्रगट
होता है प्रभु की सेवा । प्रभु की सेवा ही मानो भक्त के जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन
जाता है । प्रभु के आदेश का सेवाभाव से पालन ही भक्त के जीवन का एकमात्र उपलब्धि
बन जाती है । भक्त के लिये प्रभु ही एकमात्र अवलम्ब हैं जिनके ऊपर समस्त संसार
आश्रित है । भक्त ऐसे सक्षम प्रभु के साथ अपने को सम्बद्ध अनुभव करके उनके गुणगान
करते उन्ही की स्मृति में विभोर हो नाचता है । प्रभु पर पूर्णरूप से समर्पित ।
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