मनुष्य के व्यक्तित्व का वास्तविक
परिचय उसके अंदर विद्यमान परम् सत्य की छाया है । जो भी मनुष्य अपने वास्तविक
अस्तित्व उस परम् सत्य की उपस्थिति को अपना परिचय बनायेगा उसका ही व्यक्तित्व
सर्वोत्कृष्ट होगा । इस स्थिति को पाने में बाधा मात्र मोंह होता है । प्रकृतीय
गुणों में मोंह । इंद्रीय वासनाओं के भोग की कामना । यही आच्छादन समाप्त होते ही
हमारे अंदर विद्यमान ब्रम्ह प्रगट हो जावेगा । उसके आलोक में हमारे समस्त कृत पावन
हो जावेंगे । हमारे विचारों का दायरा सर्वहिताय हो जावेगा । हम स्वार्थ के संकीर्ण
जेल से मुक्त हो समस्त जगत के कल्याण के लिये अपनी सेवायें अर्पित करने को उन्मुख
हो जावेंगे । जिस विधाता ने हमें जन्म दिया है कंचिद उसका मंतव्य यही था ।
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