परिवर्तनशील के मोंह में जब तक
अपरिवर्तनशील आसक्त है तब तक वह बंधन में है । जब अपरिवर्तनशील परिवर्तनशील के
क्षणभँगुरता का अनुभव कर अपने अपरिवर्तनशील स्वरूप की गरिमा को अनुभव कर लेता है
तो वह मोंह से मुक्त हो परम् सत्य के स्वरूप में समाहित होने को उन्मुख हो जाता है
। प्रकृतीय मोंह मात्र भ्रम है । अपरिवर्तनीय की गरिमा सत्य है । इस सत्य का अनुभव
होना ही ज्ञान है ।
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