जब भक्त परम् सत्य पर पूर्णरूप से
समर्पित हो जाता है । परम् सत्य ही उस भक्त के मस्तिष्क की प्रबलतम भाव जाग्रित
प्रेम बन जाता है । ऐसे में फिर भक्त जो कुछ भी करता है अपने ईष्ट परम् सत्य की
महिमा में ही करता है । भक्ति अपने को पूर्णरूप से परम् सत्य को अर्पित करने का ही
रूप है । यह परम् सत्य पर विश्वास करने, उन्हे प्यार करने, उन्हे समर्पित होने, उसी परम् सत्य में समा जाने को ही भक्ति कहा जाता है । भक्ति अपनी भावनाओं का
ही फल होती है । भक्त परम् सत्य की अनुभूति करते उनकी सेवा के लिये स्फूर्ति से
भरा होता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें