परम् सत्य को अपने को समर्पित कर आप
परम् सत्य के दिव्य रूप को प्राप्त कर लेते हैं । आप के कर्म परम् सत्य के कार्य
हो जाते हैं । आप का मस्तिष्क, इंद्रियाँ, विवेक सभी उस परम् सत्य के प्रयोजन के यंत्र बन जाते
हैं । आपके कर्म परम् सत्य के प्रयोजन को प्रगट करने वाले बन जाते हैं । परम् सत्य
के वृहद प्रयोजन के आप एक सूक्ष्म अंश के रूप में आपका व्यक्तित्व हो जाता है । यह
संसार परम् सत्य का एक वृहद प्रयोजन हैं जिसमें उन्होने प्रत्येक एकाकी व्यक्ति को
किसी प्रयोजन विशेस के लिये रखा है । यदि हम आप उस परम् सत्य के उस विशेस प्रयोजन
को पूर्ण करते हैं तो ही हमारे आपके जीवन का सही प्रयोग है । स्वयँ की इच्छाओं की
पूर्ति में किये जाने वाले कर्मों की कोई मान्यता नहीं होती । इन्हे पूर्णरूप से
त्यागना ही श्रेयस्कर है ।
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