रविवार, 8 जून 2014

परम् सत्य के प्रतिनिधि

परम् सत्य को अपने को समर्पित कर आप परम् सत्य के दिव्य रूप को प्राप्त कर लेते हैं । आप के कर्म परम् सत्य के कार्य हो जाते हैं । आप का मस्तिष्क, इंद्रियाँ, विवेक सभी उस परम् सत्य के प्रयोजन के यंत्र बन जाते हैं । आपके कर्म परम् सत्य के प्रयोजन को प्रगट करने वाले बन जाते हैं । परम् सत्य के वृहद प्रयोजन के आप एक सूक्ष्म अंश के रूप में आपका व्यक्तित्व हो जाता है । यह संसार परम् सत्य का एक वृहद प्रयोजन हैं जिसमें उन्होने प्रत्येक एकाकी व्यक्ति को किसी प्रयोजन विशेस के लिये रखा है । यदि हम आप उस परम् सत्य के उस विशेस प्रयोजन को पूर्ण करते हैं तो ही हमारे आपके जीवन का सही प्रयोग है । स्वयँ की इच्छाओं की पूर्ति में किये जाने वाले कर्मों की कोई मान्यता नहीं होती । इन्हे पूर्णरूप से त्यागना ही श्रेयस्कर है । 

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