परम् सत्य का अंश हमारे सम्पूर्ण
अंत:करण में समाया हुआ है । यह किसी भी बाह्य अन्य द्वारा अभेद्य है । यह मृत्यु
और जन्म के सीमा से परे है । यह हमारे सम्पूर्ण जीवन का साक्षी होता है । इसके
अतिरिक्त शरीर का प्रत्येक घटक विकसित होने वाला व मृत्यु द्वारा विलीन होने वाला
है । जब तक मनुष्य को अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की पहचान नहीं होती और वह अपने
विनाशशील शरीर को ही अपनी पहचान जानता है वह अज्ञान के अंधकार में जीवन जीता है ।
जब भी मनुष्य अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य को अनुभव करता है उसके जीवन का
सम्पूर्ण रूप ही बदल जाता है । वह परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप कर्म करने लगता है
। परम् सत्य की मर्यादा के अनुरूप जीवनजीने लगता है । वह परम् सत्य का जीवित
प्रारूप ही बन जाता है । उसके जीवन में उसके विनाशशील शरीर का ढाँचा मात्र रह जाता
है । उसका वास्तविक जीवन परम् सत्य का ही प्रगट रूप हो आता है।
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