कर्मों की कर्ता प्रकृति है ।
कर्मों का प्रेरक आत्मा है । इस सत्य की मर्यादा को समझते हुये यदि कोई कर्म करता
है तो उसके कर्म बंधन नहीं होंगे । बंधन सदैव इच्छाओं की पूर्ति में किये गये
कर्मों द्वारा ही सम्भव है । कर्म के परिणाम से दूसरे नये कर्म की उत्पत्ति । जब
प्रेरक आत्मा कर्ता प्रकृति के कर्मों को ही प्रेरित करेगा तो उसे कर्म के फल से
कोई सरोकार नहीं होगा । परिणामत: कर्मबंधनकारी नहीं रह जावेगा ।
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