पहले तो इच्छा पैदा होती है । इस
इच्छा की पूर्ति के उद्देष्य से किये जाने वाले कर्म में एक निष्चित फल की कामना
मस्तिष्क में बसी रहती है । यही भ्रम का स्वरूप होता है । इस भ्रम के वशीभूत जो भी
कर्म किया जावेगा वह बंधनकारी होगा । किसी भी कर्म को करने में किसी फल विषेस की
कामना रखना यह भ्रम है । इस भ्रम के ग्रसित कार्य चाहे प्रगटरूप से स्वार्थ की
पूर्ति के लिये ना होकर परमार्थ को ही लक्षित क्यों ना होवे वह बंधनकारी होगा । उस
कर्म के परिणाम के आधार पर कर्ता व्यक्ति अगले कर्म को करने को बाध्य होगा ।
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