सोमवार, 28 जुलाई 2014

प्रकृति का आच्छादन

इच्छा के रूप में प्रकृति का आच्छादन किस सीमा तक परम् सत्य की मनुष्य में विद्यमान छवि को धूमिल किये रहती है इसका सही आँकलन व अनुभूति तभी सम्भव होती है जब विषेस प्रयत्नों के द्वारा इस आच्छादन को समाप्त किया जाता है । इस आच्छादन के प्रभाव से जीवन का स्वरूप आनंद से विछुड कलह तक किस प्रकार पहुँच जाता है यह प्रकृति का विज्ञान है । सहज़ रूप से बिना विचारे जीवन यापन में सामन्य प्रक्रिया के अंतर्गत मोंह का आच्छादन ही एक मात्र उपलब्धि होती है । विवेक के प्रयोग से जाग्रित आत्मचेतना के द्वारा आनंद का पथ प्रशस्थ होता है । परम् सत्य के चिंतन, परम् सत्य को समर्पण, व परम् सत्य की अपेक्षानुसार उन्ही की शक्ति से समस्त कार्यों का सम्पादन के द्वारा आच्छादित मोंह का नाश सम्भव होता है । 

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