जो मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूर्ण
शून्य कर अपने को व्यापक प्रकृति के एक तुच्छ साधन के रूप में कार्य के लिये
प्रस्तुत करता हैं वह मानों द्वैत से ऊपर ऊठ कर परम् सत्य के प्रयोजन का एक यंत्र
बन जाता है । ऐसी स्थिति प्राप्त हो जाने पर कार्य के परिणाम उसकी मानसिक स्थिति
को विचलित नहीं कर सकते हैं । वह कार्य करते हुये भी कार्य का कर्ता नहीं रह जाता
है । द्वैत परम् सत्य व प्रकृति में होता है । प्रेरक परम् सत्य कर्ता प्रकृति कर्म
को करने वाला एक यंत्र मात्र मानों द्वैत को स्वीकार कर द्वैत से परे हट कार्य में
संलग्न है । उसका तो मात्र एक लक्ष्य है अपना धर्म । एक यंत्र के रूप में कर्ता ।
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