बुधवार, 28 मई 2014

श्रीमद् भागवद गीता

कुरू वंश में दो भाई थे पाण्डु और धृतराष्ट्र । धृतराष्ट्र जन्म से अंधा था । इसके सौ पुत्र थे कौरव । इन सौ पुत्रो का विकास लालच, ईर्ष्या, घृणा, अहंकार के विचारो से प्रेरित हुआ था । पाण्डु के पाँच पुत्र थे । इनका विकास सद् विचारों के महौल में हुआ था । पाण्डु राजा थे । उनकी मृत्यु हो गई । धृतराष्ट्र ने राज्य का उत्तराधिकारी होने का दावा किया । इनको दुष्ट रिश्तेदारों का समर्थन भी प्राप्त था । कृष्ण ने मध्यस्थता की और प्रयत्न किया कि बातों के द्वारा समस्या का समाधान निकल सके । परंतु ऐसा सम्भव नहीं हुआ । युद्ध द्वारा उत्तराधिकार निर्धारित होने का फैसला हुआ । महाभारत का युद्ध । इस युद्ध को लडने के लिये दोनों पक्ष की सेनायें एकत्रित हुई । पाण्डु के पुत्रों में धनुर्धारी महायोद्धा अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में विशाद हुआ और वह युद्ध लडने से विमुख हुये । श्रीकृष्ण ने उन्हे उनके मस्तिष्क में उत्पन्न हुये मोंह को बताया और उन्हे सत्य ज्ञान को बताया । श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परामर्श दिया कि वह मस्तिष्क में व्याप्त मोंह का नाश ज्ञान की तलवार से करे और अपने कर्तव्य रूपी युद्ध को लडे । अर्जुन ने कृष्ण के परामर्श को समझा और स्वीकारा और अपने मस्तिष्क में आच्छादित मोंह पर विजय कर पुन: अपने दायित्व को पूर्ण निर्वाह करने के रूप में युद्ध लडने के लिये तत्पर हुये । यही मस्तिष्क को आच्छादित करने वाले मोंह और सत्य स्थिति का ज्ञान श्रीमद् भागवद गीता का धर्म दर्शन है । इस मोंह का नाश कैसे किया जाय और सत्य ज्ञान द्वारा कैसे कर्तव्य निर्वाह किया जाय यह पथ प्रशस्थ करता है श्रीमद् भागवद गीता का धर्मदर्शन । 

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